कविता आसपास ; महेश राठौर ‘ मलय ‘ [जांजगीर, छत्तीसगढ़]
•चिनारों को
आसमान से
आँख मिलाते
घनी हरियाली को
अपनी बाँहों में समेटे
ऊँचे और विशाल
तनों के साथ
धरती पर
मजबूती के साथ खड़े
बेहद खूबसूरत दरख़्त
‘चिनार’ के।
दृढ़ होते हैं इतने कि
बाल बाँका नहीं कर सकता
बवंडर भी।
जीवट ऐसे कि
जड़ें छेड़ी जाएँ,
तो भी होते नहीं नष्ट।
पत्तों की संरचना ऐसी कि
ये दिखाई देते हैं
हाथ के पंजों की तरह।
ध्यान से देखने पर
ये पंचानन ‘शिव’ जी जैसे
और पंख-पसारे
उड़ते हुए परिंदों के जैसे भी
दिखते हैं।
इनसे अधिक
जीने वाला
शायद ही कोई वृक्ष हो।
सात-सात, आठ-आठ
सदियों की उम्र-धरे
चिनार
वसुंधरा की गोद में
विभिन्न महाद्वीपों में
अब भी जी रहे हैं
युवा बनकर।।
इनकी पत्तियाँ
बहारों में जितनी सुंदर
दिखती हैं;
उतनी ही पतझड़ों में भी।
शाखों से
जुदाई से पहले
इनके पर्ण
सुनहरे, फीके गुलाबरंगी
दिखते हैं।
वाह! क्या जादू है;
मरने वाले भी
इतने मनोहर?
अहा!
कितना दर्शन निहित है
इस वृक्ष की
जीवन-शैली में।
शान से जीना,
शान से बिखरना।
कभी कचरा नहीं लगतीं
डालियों से
विस्थापित
मरमर करती हुईं इसकी
सूखी पत्तियाँ।
खूब सजाती हैं
चक्रवातों के साथ खेल-खेलकर
धरती के दामन को।
मेरे देश के जन्नत
‘कश्मीर’ को
खूब सजाते हैं
चिनार के बेशुमार पेड़।
इन पेड़ों के नीचे
सुस्ताए होंगे जाने कितने पथिक,
पनपी होंगी कितनी
प्रेम-कथाएँ,
हुए होंगे जाने कितने
आतंकी वारदात?
झेले होंगे ये पेड़ भी
बारूदी-विस्फोट,
अनगिनत गोलियाँ।
देखे होंगे-
बहती हुई
चिनाव, झेलम, सिंधु
और रावी के साथ-साथ
खून की नदियाँ।
चिनार और मैं
एक जैसे हैं;
इसके वंशज आस्ट्रेलिया में हैं
और मेरे भी।
मेरा बेटा ‘मीतू’ और
वधूटी ‘कविता’
रोज देखते हैं वहांँ
चिनारों की सुषमा
और मैं…
उनकी आँखों और भावनाओं से
नित्य
देखता- महसूसता हूँ
चिनारों को।
•संपर्क-
•98279 88725
🌸🌸🌸
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)