रचना आसपास : तारक नाथ चौधुरी [चरोदा, जिला – दुर्ग, छत्तीसगढ़]
{ बालासोर रेल दुर्घटना का हृदय विदारक दृश्य और असम्पूर्ण प्रेम की लिखित गवाही देती रक्त रंजित डायरियां देख संवेदनाओं के ज्वार में जो कुछ अभिव्यक्त हुआ, सादर प्रस्तुत है… }
•सिसकती डायरी
यात्रा के समय
ज़रूरी असबाबों के साथ
निरापद यात्रा की शुभकामनाओं वाली
स्नेहाभिमंत्रित पोटलियाँ भी तो थीं
उनके साथ
किंतु क्रूर नियति की प्रचंडता में
निस्तेज राख सी हो गई थीं सब
वज्रपात से भी भयावह गर्जन के साथ
अनायास टूट पडी़ थी वो
निष्पाप जिंदगियों पर…
हृदय विदारक चीत्कारों और
क्षत-विक्षत लाशों के ढेर में
मृत्यु- तांडव कर
समय की नई पटरी पर
सरपट दौड़ गई थी…
निष्प्राण देहों के पास पडी़ एक
रक्तरंजित डायरी सिसकते कह रही थी-
“छोटे-छोटे बादलों से जैसे
बारिश होती है,छोटे-छोटे मिलन-गल्प से
प्रीति पनपती है।”
“बहुत चाहता हूँ तुम्हें सोना!
हर घडी़ तुम्हारा साथ चाहता हूँ।”
…….
अपनी उदासी छुपाये और
चेहरे पर झूठी मुस्कान का उबटन लगाकर ही
विदा हुआ होगा वो
जो अपने प्रेम को सोना कहता था,
वियोग को मृत्यु का पर्याय मानता था…
कितने भारी हो गये होंगे उसके क़दम
स्टेशन की तरफ जाते हुए
अंतस़् की पीडा़ ऐसी घडी़ में
हृदय से रिसकर पैरों की शिराओंं में
जमा जो होने लगती है,अशक्त कर देती है पगों को
पहुँचकर प्लेटफाॅर्म ढूँढा होगा उसने
एक ऐसा कोना जहाँ
बैठकर लिख सका सिसकते प्रेम की डायरी।
रक्त के गाढे़ छींटों ने
छुपा लिए थे डायरी के पृष्ठों में अंकित
प्रेम की सारी रहस्मय बातें
किंतु अछूता रह गया था वो पृष्ठ
जिस पर लिखा था-
“ये यात्रा मैं तुम्हारे साथ ही करना चाहता था
सोना..
मेरी प्रतीक्षा में तुम
सोना नहीं भूलना सोना।
तुम्हा ❓
•संपर्क –
•83494 08210
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chhattisgarhaaspaas
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