कविता आसपास : हूप सिंह क्षत्रिय
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मेरी कलम से
– हूप सिंह क्षत्रिय
[ तखतपुर, जिला – बिलासपुर, छत्तीसगढ़ ]
उसके हाथ पिया जो मैंने
उस शरबत की बात न पूछो
प्यास बढ़ गयी और कण्ठ की, उससे ज्यादा बढ़ी मृदुलता
एक सखी ने कहा एक दिन
मिलने को चलना है भाई
खूब पूछते हो जिसको तुम
दशकों बाद यहाँ है आयी
मनचाहे उस आमंत्रण को
जाने कैसे ठुकरा देता
उसे मिला तो प्रथम दृष्टि में, आँखों को मिल गयी तरलता
आशंका की परवशता में
सस्मित किंतु सतर्क लगी वो
मधुपात्र भर मुझे पिलाते
कितनी अमल अमर्त्य लगी वो
पावनतामय उस विलास को
बोलो नाम कौन सा देता
पीकर लगा मुझे कि जैसे, जीवन में घुल गयी सरलता
बड़ी सहजता से उसने फिर
पूछ लिया था तुम कैसे हो?
अंतिम प्रश्न वहीं फिर आया
बच्चों के क्या नाम रखे हो?
प्रतिबंधों के बीच मिलन पर
तभी विदा की घड़ी आ गयी
विवश नयन में अब भी उसके, लगता गहन प्रेम है पलता
सोचा था जब उसे मिलेंगे
खुलकर के सौ बातें होंगी
और खुलेंगी परतें जब तो
बीते दिन औ’ रातें होंगी
किन्तु लाज का ओढ़ आवरण
मर्यादा के संग वह मिलना
शह के बिना मात के जैसी, लगती है मुझको निष्फलता
•शब्दार्थ –
मृदुलता=कोमल होने की अवस्था या भाव, कोमलता. तरलता=तरल या द्रवित होने का भाव. आशंका=संदेह. परवशता=किसी के अधीन होने की अवस्था या भाव, मजबूरी, पराधीनता. सस्मित=मुस्कानयुक्त, मुस्कुराते हुए. मधुपात्र=शरबत पीने का पात्र, गिलास. अमल=निष्पाप, स्वच्छ. अमर्त्य=दिव्य. पावनतामय=पवित्रतायुक्त. विलास=हावभाव, प्रणय क्रीड़ा. शह=शतरंज के खेल में बादशाह को दी गई किश्त. मात=पराजय.
•कवि संपर्क –
•98931 92450
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chhattisgarhaaspaas
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