मैनपाट- कविता की पृष्ठभूमि
- डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’
- कोरबा-छत्तीसगढ़
कविता की पृष्ठभूमि धरा का श्रृंगार है
दृष्टि पड़ती है जिधर बहार ही बहार है
प्रेम का अनन्य केन्द्र ये सृजन का धाम है
संस्कृति का प्रचेता बौद्ध का पैगाम है
इसके हर कण में बसा जीवन का सार है
शीतल जलवायु में नित पेड़ों का डोलना
चिड़ियों का चहचहाना झरनों का बोलना
कहता है कि मैनपाट दुर्लभ उपहार है
भरमाया करते हैं हर पथिक को रास्ते
फिर भी मन कहता है भटकने के वास्ते
अद्भुत अभिसार है अनुशंसित मनुहार है
मन में कोई ईर्ष्या है न कोई द्वेष है
यहाँ की हवाओं में त्याग का संदेश है
सबके दिलों में भाईचारा है प्यार है
चारों तरफ सजी हैं हरियई की मण्डियां
देखते ही छिपने लगती हैं पगडंडियां
धरती से अम्बर तक फूलों की कतार है
मोहक स्वर उठता है छलछलाती धार से
मिलता है आमंत्रण रुकने का पठार से
मौंसम अपना सबकुछ सौंपने तैयार है
पैरों की थाप पर जब हिलती है दलदली
लगता है नाच रही है साथ मनचली
दुर्लभ मनोरंजन है जीत है न हार है
मैनपाट कीमती है फिर भी गुमनाम है
एल्यूमिनियम क्षेत्र में भी चर्चित नाम है
इसके अंक में बाक्साइट का भण्डार है।।
पर्वतों का अभिराम रूप पी गया हूं मैं
कुछ दिनों में अपना जीवन जी गया हूं मैं
इसको अनुभूति कहूं या ये चमत्कार है

कवि संपर्क-
94241 41875
chhattisgarhaaspaas
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