कविता आसपास : तारकनाथ चौधुरी [चरोदा- भिलाई, छत्तीसगढ़]
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कैसे हो वर्तमान?
ठीक-ठीक याद नहीं.. कितने दशकों बाद आया था- मैं गाँव, अपने अतीत से मिलने
सोचा था-
मिल जायेगा
अमरइया की छाँव में
या शिव मंदिर के चबूतरे में
किंतु नहीं,वो नहीं था कहीं…. उसके विश्राम के,आनंद के
सारे ठिकानों पर परिवर्तन का अतिक्रमण हो चुका था
ढूँढते-ढूँढते”अतीत”को-
पहुँच गया था मैं
गाँव के अंतिम छोर पर
इक अंतिम आस के साथ
कि मिल जायेगा वो निश्चित ही
विराट बरगद के पास।
घुटनों पर सिर छुपाये
दुर्बल देह वाली आकृति-
मेरे प्रिय अतीत की थी।
मेरी आहट से परिचित था,
तभी तो-
मेरे निकट आते ही
पूछ लिया-
“कैसे हो वर्तमान?”
इससे पहले कि मैं
कोई औपचारिक उत्तर देता-
उसने दर्जन भर और प्रश्न
मेरी ओर दाग दिया-
कहाँ गयी तुम्हारी हँसी?
कहाँ हैं तुम्हारे दोस्त?
पत्नी और बच्चे कहाँ हैं?
प्रेम क्या मर चुका है?
संबंधों की डोर क्या टूट गयी है?
अकेले क्यों हो?
मैं अच्छा था इसलिए-
तुम मिलने आये हो…. तुम्हारे पास केवल विकृतियाँ हैं..
इससे पहले कि तुम
सयय के पृष्ठ बनो
आओ बैठो कुछ काल मेरे पास
सिखा दूँगा तुम्हें-
निस्वार्थ प्रेम की परिभाषा,
संबंधों की गुरुता,त्याग का अर्थ
जगा दूँगा अंतस में-
दया,करुणा,सहयोग,सहकार और मानवता का भाव
ताकि लज्जित न होना पडे़-
अपने वर्तमान होने पर।
• कवि संपर्क-
• 83494 08210
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chhattisgarhaaspaas
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