कविता आसपास : डॉ. प्रेम कुमार पाण्डेय
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भूत के पांव
किसी ने मज़ाक में कहा
मेरा हाथ सूंघो
मेरे दादा के दादा के दादा ने
घी खाया था।
फिर लोगों ने
सीरियसली कहा
तुम्हारे दादा के दादा के दादा ने
मेरे दादा के दादा के दादा के साथ
अत्याचार किया था
तुम दोषी हो
मुझे सूंघो।
तीन पीढ़ी बाद मेरे वंशज
ये न कहें
तुम्हारे दादा के दादा के दादा ने
मेरे दादा के दादा के दादा के साथ
अत्याचार किया था
मुझे हक है अत्याचार करने का
तुम मुझे चाटकर देखो
कर्मों की बदबू मिलेगी।
मैंने औरस को समझाया
पढ़ो, खुद को गढ़ों
स्यापा में मत पड़ो
सरकारी, असरकारी
जहां प्रतिभा का सम्मान हो
जाओ, मेधा लगाओ
श्रम- बुद्धि का सम्मान करवाओ
और हां !
पीछे मुड़कर मत देखना
भूत के पांव पीछे होते हैं।
[ कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय केंद्रीय वेंकटगिरी आंध्रप्रदेश में पदस्थ हैं.•संपर्क : 98265 61819 ]
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chhattisgarhaaspaas
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