कविता आसपास : डॉ. अशोक आकाश
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आधुनिक द्रोपदी
– डॉ. अशोक आकाश
[ बालोद छत्तीसगढ़ ]
जबरदस्ती एक दिन मुझे
धृष्टराज बनाया गया ।
द्रौपदी को भरी सभा में
चीरहरण के लिए लाया गया ।
मुझे देखते ही लाचार द्रौपदी
चीखी चिल्लाई,
आँसू बहाते
दोनों हाथ जोड़ गिड़गिड़ाई ।
बोली-:आपके रहते मेरा यहाँ
इस तरह अपमान हो रहा है।
मेरे लिए
यह अपमान की आग
आसमान हो रहा है।
अंधे हो तो क्या सुन भी नहीं सकते?
एक अबला की लाचारी
गुन भी नहीं सकते?
अपने चरित्रहीन
कपूतों पर नाज करते हो!
कैसे राजा हो?
अपने कुल की मर्यादा की
रक्षा नहीं कर सकते
और प्रजा हित की बात करते हो?
सुनते ही गुरु द्रोणाचार्य ने कहा,
सुन द्रौपदी,
हम सत्याग्रह के सच्चे अनुगामी हैं।
ना बुरा देखते हैं,
ना बुरा सुनते हैं,
ना बुरा बोलते हैं।
बस आँख कान और मुँह
बंद कर लेते हैं।
कृपया हमारी साधना में
विघ्न मत डालो,
और अपने आप को संभालो ।
तभी बीच में
भीष्म पितामह ने भी
अपना सुर मिलाया,
बोले,
यह हमारा ही बनाया रास्ता है,
जिसे अधिकांश वीरवर
सदियों से अपना रहे हैं।
दमन अन्याय अत्याचार के खिलाफ
ब्रह्मास्त्र चला रहे हैं!
बताइए,
अन्याय अत्याचार के खिलाफ
आँखें बंद कर लेना,
कितनी बहादुर का काम है।
जो हमने किया,
कोई और नहीं कर सकता ।
कोई कायर पुरुष
इतनी बड़ी बहादुरी,
नहीं कर सकता,
नहीं कर सकता,
नहीं कर सकता!
तभी मैंने अपनी आँखों को झपकाया,
ऊपर छोड़ नीचे धरातल पर आया।
देखा,
आज की द्रौपदी तो
खुद ही वस्त्र उतार रही है,
अपने हाथों अपना सुहाग उजाड़ रही है।
स्नान गृह के वस्त्र पहन घूमती,
दु:शासन को चीरहरण के लिए
ललकार रही है।
अलग-अलग सहपाठी के साथ
डेट पर जा रही है ।
ऐसे में कोई कृष्ण कहाँ आने वाला?
चीर हरण के वक्त वस्त्र बढ़ाने वाला!
मैं नहीं कहता,
आज की द्रौपदी से,
सीता, अनसुईया,
सावित्री बनो,सती बनो।
भारतीय नारी हो,
कम से कम भारतीय बनो।
सुनते ही आज की द्रौपदी ने अपना हाथ जोड़ लिया,
बोली,
कुछ नादान अबलाओं की
कलंक का टीका
मुझ पर ना थोपो ।
मैं वह नहीं हूंँ,
मेरे पहनावे को देखो और सोचो,
तब मैंने जरा गौर से देखा,
मुझे उसमें
अपनी भारत माता नजर आई,
शर्मसार हुई सकुचाई।
उसकी साड़ी
कुछ दुष्ट दु:शासन खींच रहे हैं,
कुछ कौरव उनके दामन पर गंदगी उलीच रहे हैं।
भीष्म द्रोणाचार्य धृतराष्ट्र,
पता नहीं क्यों मौन है?
बेबस युधिष्ठिर के इशारे से
तमतमाये भीम अर्जुन का
पौरुष गौण है ।
आतताईयों का दिनदहाड़े
क्रूर नर्तन हो रहा है।
वक्त के पहिए के विपरीत घूमती
आधुनिक द्रौपदी,
आँख बंद किए रोती,
पुकार रही है!
हा कृष्ण, हा कृष्ण, हा कृष्ण….
मैं कहता हूंँ,
कृष्ण जरूर आएगा,
जो मेरी भारत माता का
चीरहरण होने से बचाएगा ।
तभी
महिलाओं की भीड़ के साथ,
आँखों में बंधी पट्टी फेंकते,
गांधारी ने किया कक्ष में प्रवेश।
उसकी रग-रग में दिख रहा था,
अपने आततायी पुत्रों के प्रति आवेश।
देखते ही देखते
सभी महिलाओं ने
सभा को घेर लिया।
उन सबको आक्रोश में देख,
दुर्योधन, दु:शासन ने
अपना मुँह फेर लिया।
नारियों,
रोज-रोज रो-रोकर,
मरने से अच्छा,
लड़ लड़कर जीना सीखो।
दुर्योधन की जंघा,
दुःशासन की भुजा कुचलना सीखो।
जब तक नारी,
नारी के प्रति हो रहे
अत्याचार का
संगठित विरोध नहीं करेगी।
आततायी चाहे पुत्र हो,
प्रतिशोध नहीं करेगी
तब तक हर युग में द्रौपदी का
चीर हरण होता रहेगा
और
धृतराष्ट्र अपने अँधा होने पर
संतुष्ट होते चैन की नींद सोता रहेगा ।
• संपर्क-
• 97558 89199
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chhattisgarhaaspaas
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