रचना आसपास : गणेश कछ वाहा
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नया कीर्तिमान रचेंगे
– गणेश कछवाहा
[ रायगढ़ छत्तीसगढ़ ]

झोपड़ियों के
चूल्हों से
जब
धुँआ निकलता है
तब
मन को यह सोचकर
चैन मिलता है कि-
आज
कोई भूखे पेट
नहीं सोएगा।।
पर सोचता हूँ
कि –
हंडीयो में डबडबाते
चावल के दानो से
बच्चों की
सिसकीया क्यों
सुनाई पड़ती है?
पके चावल के
पानी से
पसीने की बू
क्यों आती है?
माँ का आँचल
आसुओं से क्यों
भीग जाता है?
जीवन क तमाम सपने
धुओ के साथ
कालचक्र में
उड़ते हुए
क्यों दीखाइ पड़ते है?
सोचता हूँ
और भी बहुत कुछ सोचता हूँ
पर
न जाने कब क्यों और कैसे
सूर्य पश्चिम में
डूब जाता है?
इसके बावजूद
मै जानता हूं
कि
झोपड़ियो की
टूटी छज्जों,
दरार पड़ी दीवारों
के कोरों से
आँगन में आती
सूर्य की रौशनी
के मध्य
अपने जीवन
के किताब के
एक एक अक्छर को
साफ साफ
लिखेंगे गढ़ेंगे पढेंगे
और एक
नया कीर्तिमान रचेंगे।।
• संपर्क-
• 94255 72284
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chhattisgarhaaspaas
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