रचना आसपास : डॉ. दीक्षा चौबे
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गीत
– डॉ. दीक्षा चौबे
[ दुर्ग छत्तीसगढ़ ]

स्वागत है ऋतुराज तुम्हारा , अभिनंदन है आज तुम्हारा ।
खेतों में सरसों पियराई , अलि ने दे आवाज पुकारा ।।
धूप सुहानी चादर बुनती , चली मंद शीतल पुरवाई ।
भोर बिखेरे मणियाँ अनगिन , वासंती चूनर लहराई ।
गेहूँ पहनी स्वर्ण-बालियाँ ,खेतों में झूमीं इठलातीं ।
हरसिंगार मधुमालिनी खिल , जग के उपवन को महकातीं ।
विविध रँगों के पुष्प मनोहर , बढ़ा रहे हैं साज तुम्हारा ।।
मधुमय संदेशा देते हैं , किंशुक खिलकर डाली-डाली ।
पंछी गीत सुनाने आए , चहक रही छुप कोयल आली ।
नित नूतन परिवेश बना कर , सजा हुआ कानन-आनन ।
अतिथि रूप में दूर देश के , पंछी आए हैं मनभावन ।
अमराई ने बौर धार के , सजा दिया है ताज तुम्हारा ।।
राहों में सुंदर पुष्प बिछा , कचनार करे है अगुवाई ।
मीठे रस से गुलदान सजा , महुआ करता है पहुनाई ।
चँवर डुलातीं पीपल-पातीं , करते जुहार बरगद दादा ।
कडुवाहट को भूल नीम ने , भर दी मिठास सबसे ज्यादा ।
प्रेमी चातक राह निहारें , प्रेम-नगर में राज तुम्हारा ।।
स्वागत है ऋतुराज तुम्हारा , अभिनंदन है आज तुम्हारा ।।
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chhattisgarhaaspaas
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