अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष : विद्या गुप्ता
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अनकही कथा…!!
-विद्या गुप्ता
[ दुर्ग छत्तीसगढ़ ]

ए स्त्री
तेरा नाम क्या है.?
नाम ….!!
ठिठक गए सहसा स्त्री के पांव
मेरा नाम…!! अचंभित चौकन्नी हो
वह खोजती है
अपना परिचय अपना नाम
आंगन से आकाश तक
अंदर से बाहर ,
अंधेरे से प्रकाश तक
तभी
आती है एक देहरी से आवाज़
तुम्हारा परिचय….!!
बेटी हो तुम, बहन हो
पराया धन हो
बहू हो तुम ….!!
दूसरी देहरी ने खोल दिए
पूरे कपाट
सिर पर लंबा घुंघट
हाथों में दिनभर काम
नदी सी बहती रही
धुएं सी उड़ती रही
चट्टान सी होकर भी
धूल सी बिखरती रही
पत्नी हो तुम
एक हुंकार …..!!
सशक्त बाहों ने पूरे अधिकार से
कर दिये
सांसों पर हस्ताक्षर
हे वामा
सप्तपदी एक शर्तनामा
तुम अर्धांगिनी हो,
नहीं हो कोई नाम और पहचान
इसके अलावा
स्त्री रचती रही थीं
आंगन में रंगोली
भाल पर रोली
तन में रति, हाथों में प्रार्थना
आंखों से
क्षमा करती रही
उन अपराधों को जो
पुरुष की आदत में शामिल थे
मां हो, सेवा करो…!!
जननी हो जन्म दो
तप करो सती बनो
यात्रा के अंतिम सोपान पर
अंधेरे कोनो में सिकुड़ती
बेनाम स्त्री
करती रही एक बंद मकान में
पृथ्वी की यात्रा
विस्मित स्त्री ने देखा
नहीं बनते हैं उसके पैरों के निशान
नहीं ऊभरता है आईने में
कोई प्रतिबिंब ना कोई प्रतिध्वनि
कौन हूं मैं…..?
स्त्री ने बचा कर रखी,
लपटों से घिरी होने पर भी
थोड़ी आग
समझने लगी थीं वह
हिकारत और अपमान की भाषा
दान और याचना के गणित
तराजू के तौल पर
अपना भार हीन होना
स्त्री ने खोज लिया
अपना नाम अपनी पहचान
हाथों की ताकत
हथेली का भाग्य
अब धरती को
रोक लेती है पैरों से
बांध लेती है
आकाश को हाथों से
अब वह दुनिया को
खिड़की की झिर्री से नहीं
दरवाजे को
खोलकर देखती है
•संपर्क-
•96170 01222
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chhattisgarhaaspaas
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