कविता आसपास : विद्या गुप्ता
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आदिम से आज तक
– विद्या गुप्ता
[ दुर्ग छत्तीसगढ़ ]

तुम और मैं
मनु और शतरूपा
ब्रह्मा की दोनों भुजाओं से
हुआ था जन्म हमारा
शुरू किया था हमने
साथ-साथ सफर
जाने कब तुम आगे बढ़ गए
मुझे पीछे चलने की देकर हिदायत
मैं तुम्हारे पीछे चली
अर्धांगिनी होकर भी
अर्धांग से नहीं
पृष्ठ भाग से जुड़ी
तुम्हारे पगचिन्हों पर चलती
होना चाहती थी
तुम्हारी सह अपराधीनी
तुमने कहा नहीं
पृथक है तुम्हारी जाति ।
बंट जाते हैं
व्यक्तिवाचक और जातिवाचक संज्ञा में हम
मेरी जाति में लागू कर देते हो तुम
अपने नियम अपने कानून
तुम्हारी कहानी में होती है
एक राजा की सात रानियां
मेरी कहानी में लिख देते हो
आचार संहिता
स्वच्छंदता तुम्हारा अधिकार
मर्यादा मेरी लक्ष्मण रेखा
पाप है मेरे लिए
पर पुरुष का स्वप्न विचार
पतन के गर्त में तुम गिरे
कारण मैं घोषित हुई
मोक्ष पर तुम्हारा एकाधिकार
नरक का द्वार मैं घोषित हुई
मैं तुम्हारे बीज की धरती
देती हूं तुम्हें विस्तार
मैं तुम्हारे वंश वृक्ष की जमीन
मगर नहीं है
फसल के अधिकार
सुनो,
कभी मन की तराजू पर
तोलोगे….!!
अपने आप को
मेरे साथ
• संपर्क-
• 96170 01222
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chhattisgarhaaspaas
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