इस माह के ग़ज़लकार : तारक नाथ चौधुरी
❤ ग़ज़ल {1}

रजनी ढलने को है।
स्वप्न छलने को है।।
पलकों पे रुका हुआ
अश्रु-कण बहने को है।।
क्षितिज रक्तिम हुआ।
सूरज उगने को है।।
संधिप्रकाश राग पर
भैरवी सजने को है।।
जीवन रुपी खेत पर।
कर्म-हल चलने को है।।
जो अपूर्ण रह गया।
काम वो करने को है।।
जो न कल खिल सकी
वो कली खिलने को है।।
तृण खगों की चोंच पर
नीड़ नव बनने को है।।
कवि है मेज़ पर झुका
कुछ नया रचने को है।।
तारक उठो तुम भी चलो
धूप सर चढ़ने को है।।
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❤ ग़ज़ल {2}

चुप्पी के पट खोल हृदय के भाव मुखरित हो गये।
हम भी इस युग के नये रंगों से परिचित हो गये।।
सतरंगी संस्कृति से जो ,सजा था विश्व गगन में,
टूटा इंद्रधनुष साम्य का ,वर्ण विकरित हो गये।।
स्वार्थ की दीवार खडी़ तेरे हृदय मेरे हृदय
धर्म के अर्थ सिमटकर कितने संकुचित हो गये।
राजनीति में हर नेता हो जाता कुशल जादूगर
पलक झपकते देखो सबके धन द्विगुणित हो गये।
न्यायालय परिसर की मूरत देख चकित*तारक* है,
किस निर्णय को सुनकर पलडे़ असंतुलित हो गये।।
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❤ ग़ज़ल {3}

कैसा शजर है कोई फूल खिलाता ही नहीं। जैसे बहरे-बेकराँ प्यास बुझाता ही नहीं।।
कितनी रातों से मेरी आँखों में नींद नहीं।
माँ की तरह मुझे अब कोई सुलाता ही नहीं।।
लिपटकर यार से खुश होने का दहर न रहा।
मर्ज़ के डर से कोई हाथ मिलाता ही नहीं ।।
नज़र में खौफ़ है सबके,दिल मे अँधेरा है।
खि़लाफ़त का हौसला कोई दिखाता ही नहीं।
उम्र का इक बडा़ हिस्सा दिया था जिसको
वो बच्चा दो घडी़ अब साथ बिताता ही नहीं।।
दयारे-मंदिर-ओ-मस्जि़द कैसा शोर है तारक
कबीरा नग्मे मुहब्बत के अब सुनाता ही नहीं।।
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[ • प्रगतिशील कवि तारक नाथ चौधुरी ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के नियमित रचनाकार हैं. • छत्तीसगढ़ चरोदा-भिलाई निवासी चौधुरी जी सेवानिवृत्त व्याख्याता रहे. • इनकी रचनाओं को ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के पाठक पसंद करते हैं, ये इसलिए कहना पढ़ रहा है कि हमारे पास सैकड़ों पत्र रचना से संबंधित प्राप्त होते हैं. – संपादक : ]
• कवि संपर्क-
• 83494 08210
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chhattisgarhaaspaas
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