






इस माह के कवि : केंद्रीय विद्यालय छत्तीसगढ़ के सरायपाली में पदस्थ, प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेम कुमार पाण्डेय

जंग
जंग को मैं पहचानता हूं
छद्म रूपों को जानता हूं
मुखौटों से परिचित हूं
कोई भी हो
कैसी भी हो
किसी के बीच हो
कहीं भी लड़ी जा रही हो
उद्देश्य कुछ भी हो
ये इतनी बेहया है
अंततोगत्वा पराजित करती है
बस आम आदमी को।
आओ मृत्यु का वरण करें
आओ मरें
टहनी से टूटे पत्ते की तरह
धीरे-धीरे
मिल जाएं खाक में।
मरें फूल-सा
रूप,रस,गंध बिखेर
हौले-हौले
बिखरें मृत्तिका पर।
मरें परिन्दों की तरह
घन घोर, निर्जन-विजन में
बहुत अंदर कहीं
शांति की गोद में।
मरें नदी की मानिंद
कृश हो
रेती की गोद में
बहुत धीरे-धीरे।
नहीं मरें कभी
मृत्यु से लड़ते डाक्टरों
सत्य को अस्वीकार करते
कुरूप बनाते
डरे सहमें लोगों के बीच।
मरें तो बस
प्रेम पूर्ण हाथों को
हाथों के बीच दबा
कर्पूर की तरह
घुल जाएं हवा में
बिना किसी शोर शराबे के।
छूटना
क्या इतना जरूरी है?
छूट जाती हैं बूंदें
रिक्त होते हैं बादल।
संबन्धी से छूट जाते हैं
आकाश में चमकते
पुच्छल तारे।
पत्तियां सूखे तनों से छूटतीं
जैसे छूट जाता है मन
कहीं अंतस से।
विचारों की डोर छूटती है
डाल से विलग
फूल की तरह।
धीरे-धीरे सब कुछ छूटता
नाज़ुक तितलियों के
रंगीन परों की तरह।
सूरज लुढ़कता है
पश्चिम की ओर
छूटती है चेतना
जैसे काया से।
सूरज
कोई घोर उदार
क्यों न हो?
परोपकारी, समृद्धिशाली हो
रीतेगा ज़रूर
समय के साथ
बीतेगा ज़रूर।
रात से पहले
दीप गढ़लो
स्नेह भरलो
बाती मललो
दिया सलाई धरलो
चाकचौबन्द हो
अपनी गांठ मजबूत करलो।
• कवि संपर्क-
• 98265 61819
chhattisgarhaaspaas
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