रचना आसपास : नुरूस्सबाह खान ‘सबा’
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ग़ज़ल

काम जिनके भी यहां हमने हैं काले देखे
मुंह में उनके ही तो सोने के निवाले देखे
जब भी रिश्तों पे पड़े परदे हटाये हमने
थे हसद के जो लगे उन पे वो जाले देखे
अपनी दुनियां को सजाने में हैं मसरूफ़ सभी
“किसको फ़ुरसत जो मेरे पांव के छाले देखे”
हमसफ़र बनके वो जब आये मेरे जीवन में
मैंने हर सिम्त उजाले ही उजाले देखे
तन के पोशाक तो बेदाग़ थे लेकिन हमने
उनके क़िरदार जहां तक भी थे काले देखे
हमको दुनियां में कोई आपका सानी न मिला
गरचे हर सिम्त बहुत चाहने वाले देखे
दौरे ज़ुलमत में हैरत की कोई बात नहीं
दस्ते आलिम में ये खंज़र जो हैं भाले देखे
ऐसे लोगों का है मंज़िल पे पहुंचना दुश्वार
जिसने दौराने सफ़र पांव के छाले देखे
शमए उल्फ़त को हवाओं ने बुझाया जबसे
उम्र भर फिर कभी हमने न उजाले देखे
ख़ौफ़ के साये में मजबूर हैं जीने को वो
जिनके होंठों पे “सबा” हमने न ताले देखे
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आह 2025

साल 2025 जब से लगा है,
हादसों का जैसे बवंडर उठा है,
बस बुरा ही सुनने को मिला है,
अभी पहलगाम को
भूले भी न थे की
काल ने एक और खेल
रचा है
विमान एक जला हैं,
दो सौ पैंसठ बेगुनाहों की
मौत का साक्षी बना हैं,
साथ जिसके एक होस्टल
भी जला है
लोग कहते हैं क़ुरान,गीता का
कोई पन्ना इस हादसे में
न जला हैं,
लेकिन सदियों से
धर्म मज़हब की जड़ों को
सीचने वाले इंसानों
के साथ
मौत ने खेल
खेला है
और वो इसमें
ज़िंदा जला है
लोग कहते हैं
गीता क़ुरान का
कोई पन्ना इसमें
न जला है
[ • कवयित्री नुरूस्सबाह खान ‘सबा’ छत्तीसगढ़ दुर्ग से हैं. ]
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chhattisgarhaaspaas
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