इस माह की रचनाकार : डॉ. दीक्षा चोबे [दुर्ग-छत्तीसगढ़]
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बादर आथे
[ छत्तीसगढ़ी गीत ]

बादर आथे घेरी बेरी, पानी ला बरसाथे।
गली खोर मा चिखला माते, घाम घलो तरसाथे।।
रेचक मेचक लइका रेंगे, कनिहा धरके बुढ़ुवा ।
मस्ती मारत हवय जवानी, जुरमिल खेलयँ खुड़ुवा।
छींकत खाँसत लइका मन ला, महतारी भुलवाथे।।
गली खोर मा चिखला माते, घाम घलो तरसाथे।।
भीथिया धुकुर धाकर करथे, चूहत हावय छान्ही।
ओइराय हे हँउला बटकी, पानी कामा लान्ही ।
रंधनी किचिर काचर होगे, चूल्हा हर सिथियाथे।।
गली खोर मा चिखला माते, घाम घलो तरसाथे।।
खेत खार अउ बारी बखरी, बने जतन ला कर लव।
इन्दर सेना मोती बाँटत, तरिया नरवा भर लव ।
धरती के अँचरा हरियागे, डाल पान मुस्काथे।।
गली खोर मा चिखला माते, घाम घलो तरसाथे।
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सजल
[ ग़ज़ल ]

कष्ट अंतस का परायों से कहा जाता नहीं।
सांत्वना थोड़ी मिले तो फिर रहा जाता नहीं।।
बाँध कर मन में रखी है वंचनाओं की नदी।
पार सीमा कर गई है अब सहा जाता नहीं।।
स्वार्थ की लंका सुपोषित द्वेष की हैं नीतियाँ।
दंभ का लंकेश जीवित क्यों दहा जाता नहीं।।
देशद्रोही को कभी भी माफ करते जन नहीं ।
पात्र जो फूटे हुए हैं जल गहा जाता नहीं ।।
चाहिए बारूद कोई भ्रष्ट शासन दे जला ।
घूसखोरी का किला झट से ढहा जाता नहीं।।
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जेखर ईश्वर हे माली
[ गीत ]

धान कटोरा छत्तीसगढ़ ह, काबर होगे जी खाली ।
खेती-बारी नोहर होगे, महँगा होगे हे थाली।।
कोन किसानी करही भइया, खेत-खार बेचागे हे।
बिन बरसा के सुक्खा तरिया, जागे फसल सुखागे हे।
जगा-जगा हवय कारखाना, अब नइ लहराथे बाली।।
धान कटोरा छत्तीसगढ़ ह, काबर होगे जी खाली।।
हरियर हरियर रुख राई ला, काबर तैं मनखे काटे।
जात पात के झगरा माढ़े, टुकड़ा मा भुइँया बाँटे ।
जम्मों दुश्मन ह खुश होवत, देख बजावत हें ताली।।
धान कटोरा छत्तीसगढ़ ह, काबर होगे जी खाली।।
जग के पेट भरइया बर गा, कतनो कन बिपदा आथे।
करजा बीमारी ले बाँचे, महँगाई हर रोवाथे।
आस टूटही ओखर कइसे, जेखर ईश्वर हे माली।।
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• 94241 32359
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chhattisgarhaaspaas
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