महेन्द्र मद्धेशिया की लघु कविताएँ
•1 आदिवासी गीत

उसने ढोल बजाना नहीं छोड़ा,
हालाँकि उसका जंगल
बेचा जा चुका था।
वह गाता रहा,
क्योंकि गीत ही
उसकी सबसे बड़ी जमीन थे।
और गीत में
उसकी माँ अब भी लकड़ियाँ बटोरती है,
उसका पिता अब भी खेत जोतता है।
• 2 गाँव

गाँव अब शहर के पेट में
धीरे-धीरे घुल रहा है।
मिट्टी की खुशबू
प्लास्टिक की गंध में दब गई है।
बुज़ुर्ग कहते हैं—
“यहाँ पहले
पेड़ खुद छाँव देते थे,
अब छाँव खरीदनी पड़ती है।
• 3 पुस्तकालय

धूल से ढकी किताबें
शांत खड़ी हैं
जैसे बूढ़ी औरतें
जिन्हें अब कोई सुनता नहीं।
अंदर दर्ज हैं
इतिहास की सारी आँधियाँ,
पर बाहर लोग
मोबाइल की रोशनी में अंधे हैं।
• 4 बारिश

बारिश में
बच्चे सड़क पर काग़ज़ की नाव छोड़ते हैं।
उनकी हँसी में
आकाश उतर आता है।
पर वही बारिश
झोपड़ियों की छत से रिसती है,
बिस्तर को गीला करती है।
बारिश
किसी के लिए उत्सव है,
किसी के लिए आपदा।
• 5 कविता की तलाश

एक कवि रोज़ सोचता है—
कविता कहाँ है?
क्या वह अख़बार की सुर्ख़ियों में है?
या किसी मजदूर की हथेली पर?
वह बाज़ार गया,
किताबों की दुकानों पर गया,
मंदिर की सीढ़ियों पर गया
और कविता कहीं नहीं मिली।
थका-हारा कवि
गली से गुज़र रहा था।
वहाँ एक बच्चा
टूटी हुई बोतल से
बाँसुरी बजा रहा था।
उसकी धुन में
भूख भी थी,
आशा भी।
कवि रुक गया।
उसे लगा,
कविता यहीं है।
सड़कों की धूल में,
लोगों की आँखों में,
और अधूरे सपनों की गंध में।
•••
[ • कवि महेंद्र मधेशिया सिद्धार्थ नगर उत्तरप्रदेश से हैं. इनकी रचनाएँ समय-समय पर ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ में प्रकाशित होते रहती है. • महेंद्रजी ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के शुभचिंतक/नियमित पाठक हैं. • संपर्क : 72660 21791 ]
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