साहित्यिक स्तम्भ ‘आरंभ’ : नूरुस्सबाह खान ‘सबा’

[ • इस माह से हम ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ में एक नया स्तम्भ ‘आरंभ’ प्रकाशित कर रहे हैं. यह स्तम्भ प्रगतिशीलता एवं जन विचारधारा को समर्पित ‘आरंभ’ है. • साहित्य का कोई अंत नहीं और अंत ही ‘आरंभ’ है, इसी उद्देश्य को लेकर बनी है ‘आरंभ’. • ‘आरंभ’ का प्रारंभ हम देश की चर्चित शायरा ‘सबा’ की ग़ज़लों से कर रहे हैं. • ‘सबा’ जी ‘आरंभ’ की संस्थापक सदस्य हैं. – संपादक ]
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ग़ज़ल-1

काम जिनके भी यहां हमने हैं काले देखे
मुंह में उनके ही तो सोने के निवाले देखे
जब भी रिश्तों पे पड़े परदे हटाये हमने
थे हसद के जो लगे उन पे वो जाले देखे
अपनी दुनियां को सजाने में हैं मसरूफ़ सभी
“किसको फ़ुरसत जो मेरे पांव के छाले देखे”
हमसफ़र बनके वो जब आये मेरे जीवन में
मैंने हर सिम्त उजाले ही उजाले देखे
तन के पोशाक तो बेदाग़ थे लेकिन हमने
उनके क़िरदार जहां तक भी थे काले देखे
हमको दुनियां में कोई आपका सानी न मिला
गरचे हर सिम्त बहुत चाहने वाले देखे
दौरे ज़ुलमत में हैरत की कोई बात नहीं
दस्ते आलिम में ये खंज़र जो हैं भाले देखे
ऐसे लोगों का है मंज़िल पे पहुंचना दुश्वार
जिसने दौराने सफ़र पांव के छाले देखे
शमए उल्फ़त को हवाओं ने बुझाया जबसे
उम्र भर फिर कभी हमने न उजाले देखे
ख़ौफ़ के साये में मजबूर हैं जीने को वो
जिनके होंठों पे “सबा” हमने न ताले देखे
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ग़ज़ल-2

घर की दीवार और दर ख़ामोश
वो जो बिछड़ा तो रहगुज़र ख़ामोश
हट गया रुख़ से जब नक़ाब उनके
हो गई बोलती नज़र ख़ामोश
हो गई हमसफ़र से अनबन जब
मैं इधर और वो उधर ख़ामोश
घर के झगड़े कभी न बाहर जाते
आप समझा के करते गर ख़ामोश
ख़्वाहिशें दफ़्न करके दिल में सब
ज़िन्दगी का किया सफ़र ख़ामोश
हर सितम का जवाब मिलता है
आह करती है जब असर ख़ामोश
टूट जाएगी डोर साँसों की
यूं निकल जाएगा बशर ख़ामोश
अब मरासिम रहे न पहले से
लग गई उनपे अब मुहर ख़ामोश
देखके आज का ये नंगापन
हो गई शर्म से नज़र ख़ामोश
किस तरह उसने कब मुझे तोड़ा
हूँ “सबा” लेके ये ख़बर ख़ामोश
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• संपर्क-
• 99267 72322
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chhattisgarhaaspaas
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