इस माह की ग़ज़ल : फरीदा शाहीन

[ • छत्तीसगढ़ भिलाई की फरीदा शाहीन, भारतीय स्टेट बैंक में उप प्रबंधक के पद पर पदस्थ हैं. • शाहीन जी कॉलेज के दिनों में राष्ट्रीय शतरंज की खिलाड़ी रहीं. • साइंस व गणित विषयों से जुड़कर भी साहित्य में इनकी विशेष रुचि रही. • ग़ज़ल, कविता को सुनते-पढ़ते,धीरे-धीरे लिखने की प्रेरणा मिली और लिखना शुरू किया. • शुभचिंतकों की सराहना मिली, हिम्मत बढ़ी व मुक्कमल उर्दू ग़ज़लें कुछ वर्षों से लिख रही हैं. • ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के पाठकों के लिए इस माह की ग़ज़ल में फरीदा शाहीन की दो ग़ज़लें प्रकाशित की जा रही हैं, प्रतिक्रिया से अवगत कराएं – संपादक ]
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ग़ज़ल-1

जब हमारे सामने इक आईना रक्खा गया
जहन में इक सर्द लम्हा, बेसदा रक्खा गया।
आईने में झांक कर कुछ देर हम चुपचाप थे
वो नहीं थे फिर भी उनका इक पता रक्खा गया
हर कोई चेहरे पे चेहरा ओढ़ कर निकला यहाँ
सच छुपा कर, झूठ को सबसे बड़ा रक्खा गया
घर के अंदर भीड़ थी, दीवार तक सुनती रही
ख़्वाब थे आँखों में लेकिन दर खुला रक्खा गया
हमने चाहा था उजाले हों सफर के हमसफर
पर हर इक रौशन चरागा को बुझा रक्खा गया
हम बहुत आसान थे, मुश्किल बना दी ज़िंदगी
हर सबक को मुफ़्त में सबसे सिला रक्खा गया
जिस पे हर आवाज़ ठहरी, हर ख़मोशी बोल उठी
एक चुप के रू-ब-रू इक सिलसिला रक्खा गया
आईना, तर्क-ए-हक़ीक़त का बयाँ लगने लगा
और उसमें जो भी था, वो गुमशुदा रक्खा गया
हम जो थे, वो थे नहीं — जो थे, वही हम न थे
सर्फ़ अहसासात पर इक मसअला रक्खा गया
तर्ज़-ए-फ़िक्रों की तग़ाफ़ुल से बनी तस्वीर थी
जिसमें इक चेहरा बहुत जानिब-दरां रक्खा गया
आज फिर चुप हैं दर ओ दीवार मेरे घर के सब
जैसे इक मातम यहाँ फिर से रचा रक्खा गया
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ग़ज़ल-2

इन आँखों में फिर इक ख़्वाब सजाने की ज़िद किए बैठी हूँ ,
जो मेरा नहीं, उसे अपना बनाने की ज़िद किए बैठी हूँ ।
जो वक़्त मुझे आज़माता है हर पल लेता है इम्तिहाँ ,
उस वक़्त को ही अब आज़माने की ज़िद किए बैठी हूँ ।
वो आया है बुझाने को मेरे चिराग़-ए-जश्न-ए-हयात ,
मैं शम्अ उन्हीं आँधियों में जलाने की ज़िद किए बैठी हूँ ।
“शाहीन ” से कह दो रुकें ना , हवाओं की इन साजिशों से ।
मैं किस्मत की लकीरों को , मिटाने की ज़िद किए बैठी हूँ ।
दुनियां कहती है, ये सब है इक दीवानापन मेरा ,
मैं पहाड़ से भी रास्ता बनाने की ज़िद किए बैठी हूँ ।
हक़ीक़त से भी आगे है मेरे इरादों की मंज़िलैं ,
मैं सरहद से भी आगे बढ़ जाने की ज़िद किए बैठी हूँ ।
‘शाहीन’ हूँ, मुझे रास हैं राहें मुश्किलों की भी ,
राहों में जो कांटे हैं, उन्हें मिटाने की ज़िद किए बैठी हूॅं।
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• संपर्क-
• 91655 55343
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chhattisgarhaaspaas
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