बाल ग़ज़ल : डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’
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अब क्या सोच रहे हो लल्ला ?
किसको देख गये हो झल्ला।
गेंद लिए गुमसुम बैठे हो,
छोड़ कहाँ आए हो बल्ला ।
आज तुम्हें भी डाँट पड़ेगी ,
झाड़ नहीं पाओगे पल्ला।
शक़ करते हैं सब दीदी पर,
रोज़ मचाते हो तुम हल्ला ।
धूम मचाकर मुसकाते हो,
खूब़ घुमाते हो तुम छल्ला।
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• 79748 50694
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chhattisgarhaaspaas
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