कवयित्री और कविता : विद्या गुप्ता [छत्तीसगढ़-दुर्ग]

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समाज में फैलता है कैंसर

कैंसर हो गया, यानी
मरना तय हो गया…!! जो कि,
तय है हर व्यक्ति के साथ
शरीर के किसी अंग में
नन्हे अंकुर की तरह उगता है
फैलता है धीरे-धीरे
कैंसर….!!
समाज में फैलता है
चारों कोनों में कैंसर….
बहुत घातक है
शिक्षा मैं फैला कैंसर फैल जाता है मस्तिष्क की शिराओं तक
मॉडर्न कहीं जाने वाली
जीवन शैली में तो कई जगह
खड़ा मिलेगा कैंसर….
राजनीति धर्म नीति भी
मुक्त नहीं है
बच्चों को पढ़ा पढ़कर
बूढ़ा हो गया बाप
जब अकेला रह जाता है
उससे बड़ा नहीं होता
कोई कैंसर
अपने बच्चों का
अंतिम बार
चेहरा देखने की आस लिए
मरती हुई मां से पूछो
उससे भयंकर होता है
कोई कैंसर…!!
विश्वास की आड़ में लुटती
चीखती औरत से पूछो
क्या कैंसर
उतना भयंकर होता है
जिंदगी के प्लान में
कहीं नहीं था विस्फोट में मरना….
चिथड़े में बंटते आदमी से पूछो
क्या उतना भयंकर
हो सकता था कैंसर
पिता कहता है मुझे कैंसर हो तो
मत करवाना इलाज
तय है दो-चार बरस और जी लूंगा
मगर मैं जानता हूं
मैं परिवार के हर अंग में
एक नया कैंसर बो जाऊंगा
सच कैंसर इतना घातक नहीं है
वह तो काफी समय देता है
लक्षणों में कहता है
मैं आ रहा हूं… संभल जाओ
बचने के बहुत अवसर है
तुम्हारे पास
सावधान…!! देखना
पलक झपकते ही कोई साया
दबोच लेगा, नहीं देगा
तुम्हें कैंसर जितना भी
समय
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निर्माण के कैनवास पर…

बचपन के पथ को
मत दो, अपने धुंधलके
अन्वेषक मन को मत दो….
लीक के अंधेरे …..
हां बच्चों के जिज्ञासु मन में कुछ प्रश्नों को उठने दो , उसके अंदर जिज्ञासाओं को पनपने दो,….. बादलों में पानी कहां से आता है ?…… दिन में सितारे क्यों नहीं दिखते ?…… पेड़ के पत्ते क्यों सूखते हैं ? परछाई क्यों बनती है ? अंधेरे में डर क्यों लगता है ?….
उसके संशय को
और गहराने दो…..!!
टूटेंगे एक दिन
अंधेरे आच्छादन
वह खोज लाएगा जुगनू सी रोशनी
खोलेगा स्वयं अपनी गांठें…..!!
जिज्ञासाएं
देती हैं आमंत्रण ….!!
प्रश्न खोजेंगे हल
घूमती है धरती,
या घूमता है सूरज..??
उसका कॉपरनिकस
स्वयं खोजेगा हल …..
यद्यपि यह सच है कि हर पिता अपने बच्चे का मार्गदर्शक होता है, अपने अनुभव से उसका पथ निर्देश करता है मगर बगैर जिज्ञासा के थोपा हुआ उत्तर भी बच्चों के मार्ग को अवरुद्ध करता है। उसे खोजने दो, प्रश्नों से परेशान होने दो …. जिस दिन वह स्वयं अपने प्रश्न का का हल खोजेगा…..!!
वह रुकेगा नहीं,
चढ़ाकर
तुम्हारी श्रद्धा पर अक्षत चंदन
उसे तलाशने दो
अपनी पूजा का पात्र,
उसे बुद्ध नहीं
बोध पाने दो
स्वयं में बोधिसत्व होने दो
• कवयित्री संपर्क-
• 96170 01222
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chhattisgarhaaspaas
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