लेख : मैं और मेरी जिंदगी – साजिद अली सतरंगी
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मैं और मेरी जिंदगी
– साजिद अली सतरंगी
[ मेरठ उत्तरप्रदेश ]

चेहरे पर मायूसी ओर ऑंखों में अजीब सी चमक लिए वो बरामदे में बैठी थी। सफ़ेद बालों की लटें हवा में लहरा रही थीं और उसकी आँखों में बेशुमार कहानियाँ छिपी थीं।वह अपनी मासूमियत से सभी का ध्यान अपनी और खींच तो रही थी, मगर उसका नाम किसी ने कभी पूछा ही नहीं, क्योंकि सब उसे एक ही नाम से जानते थे— वो नाम था ज़िन्दगी।
यह वही “ज़िन्दगी” जिसकी ऑंखों में अजीब सी चमक और चेहरे पर उदासी मगर उससे मिलना आसान नहीं था। कोई उसे हँसते हुए देखता, तो कोई रोते हुए; कोई उसे अपनी जीत मानता, तो कोई हार। फिर भी वो हर इंसान के साथ हमेशा चुपचाप एक हमसफ़र की तरह चलती रहती थी। “ज़िन्दगी”
बचपन की गलियां
ज़िन्दगी ने अपनी कहानी की शुरूआत मासूमियत की गलियों से। मिट्टी में बने घरौंदे, कंचों की खनक, पेड़ों से लटकते हुए झूले और माँ की गोद—यही उसकी पहली शक्ल थी। वो कहती थी,
“देखो, यही वो वक़्त है जब इंसान बिना डर, बिना लालच के सिर्फ़ खेलना जानता है। अगर दुनिया की सारी सच्चाई भूल जानी हो, तो बचपन याद करो।”
जवानी का मरहला
जैसे जैसे “ज़िन्दगी” जवान हुई। उसके चेहरे पर लाखों सपनों की चमक थी और आँखों में नये नये रंगों की दुनियाओं की प्यास थी। वो कभी पहाड़ों की चोटियाँ नापना चाहती थी, तो कभी आसमान को छूना चाहती। उसी मोड़ पर कई दोस्त बने, मुहब्बत मिली, कुछ सपने पूरे हुए, कुछ अधूरे रह गए।
कभी वो हँसती—“देखो, मुहब्बत इंसान को उड़ना सिखाती है।”
कभी रोती है—“ओर जुदाई इंसान को समझना सिखाती है।”
ज़िन्दगी की कशमकश
जैसे उसने कमसिनी की दहलीज पार की तो एक दिन अचानक उसकी राह कठिन हो गई। कही राह में काँटे तो कहीं आँधियाँ थीं, भूख और थकान थी। तब हल्के से मुस्कुराते हुए “ज़िन्दगी” ने “ज़िन्दगी” से कहा,
“अगर सब कुछ आसानी से मिल जाए तो मज़ा ही क्या? असली मज़ा तो गिरकर उठने में है।”
और सचमुच, जब से उसने गिरकर उठना सीखा है, तभी से उसकी चाल में ठहराव और आँखों में आत्मविश्वास आया।
रिश्तों का जाल
जैसे एक नन्हा बच्चा अपनी मां के आंचल के बिना नहीं रह सकता ठीक वैसे ही ज़िन्दगी अकेली नहीं रह सकती । वो माँ के आँचल से जुड़ी, पिता की परवाह से सँवरी, ओर दोस्ती की हँसी से महकी एवं मुहब्बत के आलिंगन से खिली। लेकिन उसने यह भी देखा कि कभी रिश्ते टूटते हैं, तो कभी दिल बिखरते हैं। तब ज़िन्दगी ने धीरे से फुसफुसाया, ओर कहा
“रिश्तों को निभाने के लिए अहंकार छोड़ना पड़ता है, वरना यह सफ़र कभी मुकम्मल नहीं होता।”
तन्हाई के लम्हें
कभी-कभी वो भीड़ में भी अकेली हो जाती है। उसके चारों तरफ़ लोग तो थे, मगर कोई ऐसा न था जिस किसी से अपने दिल की बात कहने की हिम्मत होती। उस वक़्त उसने आईने में खुद को देखा और मुस्कुराकर बोली।
“असल में सबसे गहरी दोस्ती इंसान की खुद से होती है।”
एक रात की तन्हाई ने उसे सिखाया कि सुकून बाहर नहीं, भीतर मिलता है।
बुढ़ापे की शाम
आख़िरकार, उसकी चाल धीरे धीरे धीमी होने लगी। आँखों में सपनों के बजाय तजुर्बों की झुर्रियाँ उतर आईं। वो बरामदे की एक टूटी हुई कुर्सी पर बैठकर मुस्कुराती और कहती,
“देखा? सब कुछ गुज़र गया—खुशियाँ भी, ग़म भी, मुहब्बत भी। बस यादें रह गईं।”
उसके हाथ काँपते ज़रूर थे, लेकिन दिल शांत था। अब उसे पाने की चाह नहीं थी, बल्कि बाँटने की ख़ुशी थी।
ज़िन्दगी का राज़
जब किसी ने उससे पूछा— “ज़िन्दगी”, तू आखिर चाहती क्या है?”
वो मुस्कुराई और बोली—
“मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे समझो। मुझे शिकायतों से मत भरो। मैं मुश्किल भी हूँ, मैं आसान भी; मैं आँसू भी हूँ, हँसी भी। अगर तुम हर पल को शुक्र के साथ जियोगे तो मैं जन्नत बन जाऊँगी। अगर तुम हर वक़्त रोओगे, तो मैं तुम्हें एक दिन बोझ लगूँगी।”
उसने आगे कहा—
“देखो, मैं एक किताब हूँ। हर इंसान को इसमें अपनी कहानी लिखनी होती है। कुछ लोग ग़म लिखते हैं, कुछ लोग उम्मीद। मगर याद रखो, आख़िरी पन्ना बंद होने से पहले तुम्हें यह तय करना है कि तुम्हारी कहानी कैसी हो।”
नतीजा आखिर में
ज़िन्दगी एक दोस्त भी है, एक उस्ताद भी, एक इम्तिहान भी और एक रहस्य भी। वह हमें हर रोज़ नए रंग दिखाती है। कभी सपनों का आसमान, तो कभी आँसुओं का सागर, कभी रिश्तों का बाग़ तो कभी तन्हाई का जंगल।
लेकिन उसकी सबसे बड़ी सीख यही है—
“ज़िन्दगी को जीना है, सिर्फ़ काटना नहीं। हर लम्हें को महसूस करना है, हर दर्द से सीखना है और हर खुशी को बाँटना है।”
• लेखक संपर्क-
• 94575 30339
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