स्तम्भ : कविता आसपास ‘आरंभ’ – तारकनाथ चौधुरी
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• सीढ़ी

समी चाहते हैं सीढी़
सभी चाहते हैं ऊपर चढ़ना
इसीलिए आदिम युग से अब तक
सीढी़ की उपयोगिता पर अनुसंधान जारी है
और समय के साथ उसका स्वरुप भी बदलता रहा है
किंतु बदला नहीं सीढि़यों का भाग्य
रौंदे ही गये हैं पैरों तले
स्थिति भी नहीं बदली कभी उनकी
जैसे कि बदलती नहीं स्थितियाँ शोषितों की
घर से समाज तक व्याप्त- साँस लेती,आघात सहतीं अदृश्य सीढि़यों की।
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• ग्राम्य कवि

गाँव के अंतिम छोर पर
इतिहास पुरुष की तरह खडा़
बरगद का पेड
ग्रामवासियों के स्नेह के चबूतरे के सहारे
अपनी उखड़ती साँसों(जडों)को
सँभाले हुए है……
तपती धूप से बेहाल प्राणियों और
थके पथिकों को विश्राम देता वो
अब देव प्रतिम हो गया है….
शीर्णकाय शर्मा जी
जिन्हें कोई महाराज,कोई गुरुजी
तो कोई कविवर कहकर पुकारता….
हर सुबह काँधे पर झोला
और उँगलियों में बीडी़ फँसाये
चले आते हैं-
बरगद की छाँह तले बने
चौकोर चबूतरे पर।
कोटर में धँसी पुतलियों से
दूर तक फैली काव्य भूमि पर
होने वाली गतिविधियों को
बीडी़ का कस लेते हुए
गंभीर मुद्रा में देखते ग्राम्य कवि
प्रतिदिन लिखते हैं एक कविता।।
मुझको मालूम है
उनकी कविताओं में नहीं होगा
शहरी प्रदूषण,युवाओं का अशालीन आचरण,
राहजनी,आगजनी,लूट और
बलत्कार की बातें…. उनकी देह सी ही जीर्ण डायरी के पृष्ठों पर होगा
किसानों के परिश्रम का सौरभ,
पहाडी़ झरने का सरगम,
कोयल की कूक,पलाश का सौंदर्य
और अगली पीढी़ को
काँधे पर उठाये दादा/नाना के लोक गीत।
काश!मैं भी होता एक ग्राम्य कवि।
[ • तारकनाथ चौधुरी शासकीय विद्यालय से सेवानिवृत्त होकर लेखन में निरंतर सक्रिय हैं. • आप प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के संस्थापक सदस्य हैं. ]
• कवि संपर्क-
• 83494 08210
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chhattisgarhaaspaas
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