स्तम्भ : कविता आसपास ‘आरंभ’ – पं. अंजू पाण्डेय ‘अश्रु’
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बृज की बात

बृज की बात ये बृज के ग्वाल बाल बृज की हर नार पे प्रीत लुटावत् है
बार बार बृषभानुजा करे मनुहार बार बरबस मंद मंद मुस्कावत है
मायाधीश करे माया माय यशुमति को मनावत है,बन के सहज मिठ बोरी बतियावत है ,
गोपियां संग लाड लड़ावत ग्वाल संग दधि चुरावत बिहारी
गोकुल गौ ग्वाल संग वन बन डोलत है,यमुना के तट कदंब के विटप मुरली की टेरसुनावत है
बाल लीलन को देख देखतीनों लोक संग देवन इठलावतहै
खीजे दाऊ संग गोप ग्वालिन गिरधर , गुपचुप लीला दिखावत हैं
देखदेख श्याम श्यामा जू लाडली पे मंद मंद मुस्कावत अश्रु अशुवन सुमन नेह बरसावत है तीनों लोकन के सुख बिसरावत अश्रु प्रभु सिमरन दिन बितावत हैं
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करूण क्रंदन कोकिल का

कोकिल, करुण क्रंदन तेरा प्रश्न प्रगटित करता है।
कोमल कूक करुण पुकार हृदय बेधित करता है।
क्यों स्वर इतना वेदित मार्मिक,
क्यों शोर इतना द्रवितकारुणिक
तमस चीर प्रबलित चीत्कार, विद्रोही सा लगता हैं
क्या तुमने भी गरल जानाअतुलित परतंत्रता बंधन को,
या अकल्पित माना, सरल
स्वतंत्रता लक्ष्य संधान को,
क्या ,गोरी ! काली कपटी कलुषित लोगो काअभिनंदन तुम्हे कटोचित करता है?
कोकिल, करुण क्रंदन तेरा
हृदय विदारक लगता है।
क्या खोया ,क्या पाया देखा,जो स्वर विखंडित लगता है।
रक्तरंजित संबंधों, छल आगे विजय नतमस्तक सा लगता है।
आने को मधुमास ,मनोहर
मनभावन,मनुहार ,मनोरम
जीवन , स्फूरित करता मदमस्त पवन पर कोकिल स्पंदन तेरा विचलित क्यों?इतना लगता है
कोकिल,क्रुद्ध करुणक्रंदनतेरासंवेदित करता है ।
गोरे के प्रतिकार प्रबलित तान तेरा प्रयास प्रस्फुटित करता है
अपने पाले विभीषणों का कृत अचंभित करता है
कोकिल तेरा करुण क्रंदन
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विद्या मुक्तक

चउथा स्तम्भ समाज जेकर मै आधार आव ,
ओकर सुख दुख के परमाण आव,
गरु होथे अतका, तोला दुख लागथे पर बर जतका,
का बताव? संगी ! मै हर
सुकालू के दाई के परान , बिसौहा के नाती के पोनतरा (गुदढ़ा), तव मोर ममादाई के
संदूक आव,
जेकर चिराय चेंदरी में खुसरेथे रूपिया निराश्रित के,
रपोट के बईठथे ,कुकरी का सेथे
वोकर झोलगा खटिया के मुड़सरिया ,जान आव,
परोसिन लछमिन बेवा के संसों पहाड़ आव,
महल के रहइया का जानबे
मोला, मैं कुंदरा (झोपड़ी)के संस्कृती आव,
मैं हर जटना,ओड़ना ,
बिछवना अऊ मलमल के अंबार आव,
मही ओकर सुख सोहर ,मही मरिया के चिनगारी आव, सिरतोंन बताव पुरुत बरोबर आरथिक समस्या भंडार आव, बिनबादर कमइया मन के ऊपर गिरै गाज आव,
मैं कथरी बड़भागिन नयकी(नई)बहुरिया ल कोरा देवईयां सखि आव,
ताना-बाना जिनगि के इतिहास बताइया मैं अब्बड़ सुघग्गर कथरी आव,
कथरी जईसे जिनगि के सुघग्गर
फुलकारी,
जेमा मोहाय मया चासनी म डूबे तोर आंखी
कथरी असन असरू पीरा
निक अब्बड़ दिखे ले लागए,
जईसे ऊपरछवा मुसकीमारना ,
जेकर गथना सुघग्गर लागे,फेर सूजा के पीरा ल कथरीच जानै .
• पं. अंजू पाण्डेय ‘अश्रु’
• रायपुर छत्तीसगढ़ की ‘अश्रु’ जी ‘अखिल भारतीय ब्राह्मण एकता परिषद्’ छत्तीसगढ़ राज्य की अध्यक्ष हैं. • प्रकाशित कृति- ‘दुनिया के रंग नए’/ ‘मेरे सपनों की दुनिया’/ ‘सहर्ष तुम स्वीकार करो’/ ‘राही साथ चलते हैं’/ ‘सर्वोदय साझा संकलन’/ ‘आश्रांजलि’ और ‘यूथिका’. • अनेकों सम्मान से सम्मानित ‘अश्रु’ जी प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की सदस्यता ग्रहण करने की इच्छा जाहिर की है. • वर्तमान में आप होली हार्ट उच्चत्तर विद्यालय इंग्लिश मीडियम अध्यापिका के रूप में कार्यरत हैं. • ‘अश्रु’ जी लेखन के माध्यम से अंतर्मन की अनकही पीड़ा को कुछ ज्वलंत मुद्दों, सामाजिक विसंगतियों को शब्दों से चेतना जागृत करने में सतत् क्रियाशील हैं. • ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ में ‘अश्रु’ जी की यह पहली रचना प्रकाशित है. – संपादक
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chhattisgarhaaspaas
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