संस्मरण : ‘धरा का श्रृंगार उल्टा पानी’ – दीप्ति श्रीवास्तव
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छत्तीसगढ़ का शिमला ‘मैनपाट’
– दीप्ति श्रीवास्तव
[ छत्तीसगढ़ भिलाई ]

धरा अपने वस्त्र की तासीर हर जगह अलग अलग रखती है। कहीं खनिज तो कही पानी कही दलदल आदि आदि …। धरा की बिटिया प्रकृति भी कभी कभी अपने कारनामे से हमें आश्चर्यचकित कर देती है l अपने ना देखा होगा और ना सुना होगा परन्तु इस सत्य की अनुभूति हमें उस स्थान पर जाकर हुई जहाँ पानी उलटी दिशा में बहता है पहाड़ों से पानी नीचे की ओर बहता है पानी की अपनी खासियत होती है ढलान की ओर बहना पर यहां तो नीचे से ऊपर बहता है प्राकृतिक छटा के बीच विरोधाभासी जगह है यह l
प्रकृति की वादियों में बसा अंबिकापुर का गांव
मैनपाट जहां कुदरत के साइंस के अनेको नजारें आप देख सकते है l मैनपाट को छत्तीसगढ़ का शिमला कहा जाता है l
यहां हाल में घूमने जाना हुआ l विंध्याचल पर्वत की खूबसूरत घाटियों से होते हुए पहाड़ के पठार पर बसा गांव मैनपाट l किसी जमाने में वहां पहुंचने में काफी समय लगता था l आज सर्पीली सड़कों पर गाड़ियां मजे से आती जाती , एक दूसरे से होड़ लगाती दिख जाती है l
कभी सरकार ने तिब्बतियों को यहां बसाया था आज उनकी बस्तियां मन्दिर देखने योग्य है l साथ ही उनके द्वारा की जाने वाले मिलेट टाऊ की खेती।
पठार पर भी एक पहाड़ी ! जहाँ पानी उलटी दिशा में बहता है यानि नीचे से ऊपर की ओर जल धारा जाती है बारह मास यहां पानी नीचे से ऊपर चलता है इसकी पुष्टी आप कागज की नाव या पत्ते डाल कर सकते है l इसी स्थान पर हमारी गाड़ियां भी अपने आप ऊपर की ओर बढ़ती है इसका वैज्ञानिक कारण धरती माता का गुरुत्वाकर्षण बताया जाता है l है ना अजीब सा हमारी धरती माता का इठला कर अपने वजूद का नया पहलू दिखाना l
मैनपाट में धरा का इठलाना जारी रहा…जलजला भी ऐसा ही विस्मयकारी क्षेत्र है जहां हम पृथ्वी कर उचकते तो वह भी हमारे संग उचकती है l यानि हम कूदते है तो धरती आंदोलित होती है हम भी बच्चों की माफिक उचक उचक कर बहुत मजा किये दर असल यह दलदली क्षेत्र है l हम आम मनुष्यों के लिए तो यह एक अजूबा और मनोरंजन के साथ प्राकृतिक नजारे से भरपूर बढ़िया जगह है l
मैनपाट के आसपास के झरने अपनी अलग कहानी कहते है नयनाभिराम दृश्य नजारा आंखो में भर लो
सभी झरने एक दूसरे से भिन्न जैसे हर पेड़ की पत्ती अलग अलग होती वैसे ही हर झरना अपने आप में भिन्नता लिए होताहै l जहां पर जंगल में पक्षियों की मस्ती भरी आवाज मंत्रमुग्ध कर देती है l जंगल में पानी की कल-कल करती ध्वनि और पक्षियों का कलरव हमारी जिंदगी में उल्लस का तड़का लगा जाता है l मन झूम उठता है और आप भी कहुकने लगते है उनके सुर में सुर मिलाने लगते है l
हम मानव जाति प्रकृति को कितनी पीड़ा पहुंचा रहे है जंगलों के ह्रदय पर कुल्हाड़ी से वार कर उनका जीवन नष्ट कर रहे है शनै शनै इन जंगलों से घटते वृक्ष अपना रुन्दन किसी से कह नहीं पा रहे है l हमें इन्हें संरक्षण प्रदान करना ही होगा इनकी नैसगिर्क आत्मा जीवित रखना अपना धर्म बनाना होगा l आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण बचाये रखना होगा l आज हम पानी खरीद रहे है भविष्य में आने वाली पीढ़ी को आक्सीजन खरीदना होगा । मुहल्ले में शुद्ध आक्सीजन ले लो का हांका लगाते वेंडर दिख जायेंगे। कोरोना समय में इस स्थिति का नमूना देख चुके है l
उल्टा पानी स्थान में जंगल के एक पेड़ से निकलता पानी ही ऊपर की ओर चढ़ता है । इन पेड़ रूपी खजानों को बचाना हमारा कर्तव्य है साथ नये पेड़ लगाना हमारी जिम्मेदारी । वृक्ष धरा के श्रृंगार है l श्रृंगार किसे अच्छा नहीं लगता l
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• लेखिका दीप्ति श्रीवास्तव, प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की संस्थापक सदस्य है एवं निरंतर लेखन में सक्रिय हैं. • संपर्क- 94062 41497 ]
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