स्तम्भ : कविता आसपास ‘आरंभ’ – विद्या गुप्ता

▪️
हादसा
– विद्या गुप्ता
[ छत्तीसगढ़-दुर्ग ]

थोड़ी देर बाद
बदल जाएंगे दृश्य
जब वे जानेंगे
नहीं है अब नाव में,
पतवार खेने वाले हाथ…!!
अभी…. वह जो
ढेर सारी चिंता माथे पर
कंधे पर ढेर सारी व्यस्तता लिए
आती जाती है बार-बार
अंदर बाहर
वह मां है
चूल्हे के पास
रोटी थापते हाथ सेंक रहे हैं
पसंद की गंध स्वाद
गरम रोटी और प्रतीक्षा के बीच
बैठी है जो
वह पत्नी है उसकी
दुनिया से अनजान
बाहर रेत में घरोंदे बनाती तुतलाहट
वह बिटिया है उसकी
कपड़े फैलाने उठाने के बहाने
पड़ोसी के बेटे से आंखों जोड़े
प्यार की दुनिया बसाती
बहन है उसकी
छोटी बड़ी हर बात में
याद करता उसे
अंधे की लाठी की तरह
विश्वास करता
वह पिता है उसके जो….!!
जो….!!
अभी-अभी मारा गया
झंडो की लड़ाई में
सड़क पर
देखते देखते बदलेगा परिदृश्य
धधक उठेगी लपट सी मां
जले कागज सा
बिखर जाएंगे पिता
चूल्हे के पास
पत्थर हो जाएंगी प्रतीक्षा
कटी पतंग से
कट जाएंगे बहन के स्वप्न
बेखौफ बचपन
पत्थर हुई मां को
फिर भी बतलाएगा रेत से चुनी
शंख सीपियां
थोड़ी देर बाद
घर में उतर आएगा मरघट,
मरघट में
लग जाएगा मेला
जान जाएंगे जब
अब नहीं लौटेगा
आने वाला….
जिसकी
सभी को प्रतीक्षा थी
• कवयित्री संपर्क-
• 96170 01222
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)