इस माह के कवि और कविता – महेश राठौर ‘मलय’

• महेश राठौर ‘मलय’
[ • छत्तीसगढ़ सारागांव, जिला-जाँजगीर चांपा निवासी ‘मलय’ जी शासकीय एमएमआर स्नातकोत्तर महाविद्यालय से प्रयोगशाला शिक्षक पद से सेवानिवृत्त हैं. • 31 अगस्त 1963 को जन्में ‘मलय’ गद्य और पद्य दोनों विधा में लेखन कार्य निरंतर करते आ रहे हैं. • ‘अक्षर साहित्य परिषद्’ की स्मारिका ‘स्पंदन’ एवं महाविद्यालयीन पत्रिका ‘युगांतर’ का संपादन किया. • अनेकों सम्मान से सम्मानित ‘मलय’ जी की कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होते आ रही है. • छत्तीसगढ़ आसपास’ में भी विशेष अवसरों में कविताओं का प्रकाशन हुआ है. इस माह के ‘कवि और कविता’ में इनकी रचनाओं का चयन पहली बार किया गया है. – संपादक ]
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मेरी कविताएं

मेरे मरने के बाद
देखना-
सूरज की किरणों से
उतरेंगी
मेरी कविताएंँ.
देखना-
पूर्णेन्दु को,
उसकी कौमुदी में
बिखरी मिलेंगी
मेरी कविताएँ
देखना-
बादलों से
बारिश के साथ
झरेंगी
मेरी कविताएंँ.
देखना-
नदियों के
कल-कल करते
रजत-वर्णी प्रवाह में
मचलती-बलखाती हुईं
दिख जाएँगी
मेरी कविताएंँ.
दिख जाएँगी-
गिरि-शिखरों को चूमते
मेघ-समूहों
और
गरजते सिंधु की
उठतीं-गिरतीं लहरों में भी
मेरी कविताएँ.
ध्यान से खोजना-
गगनरूपी श्यामपट पर
तारों की लिखावट में
मिल जाएँगी
मेरी कविताएँ.
पंछियों को
नीड़ की ओर लौटाती
साँवली साँझ को देखना,
वहाँ भी पा सकोगे
मेरी कविताएंँ.
वसंत में
आम के बौरों को देखना,
बौराए चंचरीकों को,
पीली सरसों और
सिंदूरी टेसुओं को देखना,
सुरभित हवाओं को महसूसना,
मदनशलाका की
कुहुक को सुनना,
इन सबमें मिलेंगी
मेरी कविताएँ.
जहाँ भी देखना-
निसर्ग का सौंदर्य,
ठुमकता शैशव,
वनिताओं का लावण्य,
मृदुल मधुर मुस्कान,
सरसता, कोमलता,
जीवन मूल्य, उदात्त चरित,
स्वाभिमान, वीरता,
मानवीयता,
वेदना, विषमता,
प्रेम की निश्छलता,
वाणी का माधुर्य,
नदियों में तैरती नौकाएँ,
लहलहाती फसलें
गरीबों के आँसू,
झरनों की रागिनी,
चहचहाती चिड़ियाँ,
चटकती कलियाँ,
मकरंद बटोरती तितलियाँ,
कमल और कुमुद से भरे
जलाशय में विचरते
मराल-युगल, पनघट,
निर्मल जल में
किल्लोल करतीं सखियाँ,
विपिनों में
चौकड़ी भरते मृग,
खेतों की पगडंडियाँ,
धेनुओं के झुण्ड,
मुरली बजाता ग्वाला,
यौवन की मादकता,
प्रेम-पगी आँखें,
और-और-और भी
प्रकृति के अगणित आलंबन;
वहाँ होंगी
मेरी कविताएँ.
मेरी रुधिर-वाहिनियों में,
रक्त के साथ बहती है
परम पावनी कविता.
मरने के बाद भी
मेरी आत्मा
लिखती रहेगी कविताएंँ.
▪️
गीत

भारी-भारी रात लगे।
थका-थका-सा गात लगे।
नभ में चंदा है लेकिन,
शीतल करता नहीं मुझे।
तारे भी हैं अनगिन पर,
मुझको लगते बुझे-बुझे।
मद्धिम बहती है फिर भी,
वात-छुअन आघात लगे।
भारी-भारी……
गीतों का स्वर कानों तक,
मधुरिम लाती संग हवा।
स्वाद नहीं ले पाता पर,
मेरे दुख की नहीं दवा।
आसपास है रौनक पर,
भली न कोई बात लगे।
भारी-भारी……
निशा लावणी अलबेली,
मस्ती वाली फगुनाई,
ढोल-नगाड़े बजते हैं,
कणिका-कणिका हरषाई।
किंतु वियोगी मन अपना,
मुरझाया जलजात लगे।
भारी-भारी…….
▪️
परम सौंदर्य

प्रिये!
मैं तुम्हें चाँद-सी
नहीं कहूँगा.
क्योंकि…..
चाँद रोज कहाँ चमकता है?
तुम तो रोज चमकती हो.
मैं तुम्हें
फूल नहीं कहूँगा.
क्योंकि…..
फूल एक दिन, दो दिन में ही
मुरझा जाते हैं.
तुम तो
हमेशा खिली रहती हो?
मैं तुम्हें
तुहिन-कणों की भाँति भी
सुंदर नहीं कहूँगा.
क्योंकि….
ये तो सूरज के आते ही
ढल जाते हैं.
मैं तुम्हें
उषा या संध्या भी
नहीं कहूँगा.
क्योंकि…..
इनकी आयु भी
घण्टे-दो घण्टे की होती है.
तुम्हारी चितवन की
लालिमा तो
चिरकालिक है.
प्रियतमे!
मैं तुम्हें
ऋतु वासंती या वर्षा भी
नहीं कहूँगा.
क्योंकि…..
इनका जीवनकाल भी तो
दो महीने, चार महीने का
होता है.
तुम तो चिरंतन हो.
मैं तुम्हें
घटा या सौदामिनी भी
नहीं कहूँगा.
क्योंकि…..
इनकी सुंदरता भी
तुम्हारी तरह
टिकाऊ नहीं है.
वल्लभे!
तुम्हारी धवलता को
मैं संगमरमर जैसी भी
नहीं कहूँगा.
क्योंकि…..
संगमरमर में
तुम्हारी तरह
मखमली कोमलता कहाँ?
मैं तुम्हारी उपमा
नदी और सागर की
लहरों से भी नहीं करूँगा
क्योंकि…..
लहरें चंचल होती हैं
और तुम नितांत गंभीर.
प्रिये!
तुम बहुत सुंदर हो,
सबसे सुंदर हो.
सृष्टि के सभी पदार्थ
तुम जैसे हो सकते हैं,
तुम उन जैसी नहीं
हो सकती.
तुम केवल तुम जैसी हो.
तुम अनुपम हो,
अद्वितीय हो, विलक्षण हो,
सौंदर्य का चरमोत्कर्ष हो.
क्योंकि…..
मैं तुम्हें
सुंदर कहता हूँ
और ….
कवि जिसे सुंदर कहे,
वह परम सुंदर है.
और
इसी परम सौंदर्य में
मुझे दिखाई देता है
ईश्वर का अस्तित्व.
• कवि संपर्क-
[ महेश राठौर ‘मलय’, ‘अभिराम’, आई.बी.रेस्ट हाउस रोड, पुरानी सिंचाई कॉलोनी के पास, जांजगीर- 495668,छत्तीसगढ़. मोबाइल नं. 98279 88725 ]
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chhattisgarhaaspaas
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