आलेख : ‘बहकता बचपन’ – साजिद अली ‘सतरंगी’
▪️ लेखक : साजिद अली सतरंगी
[ मेरठ, उत्तरप्रदेश ]
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‘बहकता बचपन’

एक चिंताजनक सच्चाई
बचपन किसी भी इंसान की ज़िंदगी का सबसे मासूम, सबसे नाजुक और सबसे अहम दौर होता है। यह वह उम्र होती है जब संस्कार, शिक्षा और परवरिश की नींव रखी जाती है। लेकिन आज यह पाकिज़ा दौर भी बहकावों और भटकावों की भेंट चढ़ता जा रहा है। मोबाइल, इंटरनेट, सामाजिक दबाव, बिगड़ता पारिवारिक माहौल और शिक्षा का व्यावसायीकरण — इन सबने मिलकर बचपन की मासूमियत पर ग्रहण लगा दिया है।
तकनीक से जुड़ाव
आज का बच्चा जितना तकनीकी रूप से तेज है, उतना ही भावनात्मक रूप से अकेला भी होता जा रहा है। स्मार्टफोन की स्क्रीन पर घंटों बिताने वाले ये बच्चे असली दुनिया से कटते जा रहे हैं। खेल के मैदान खाली हैं, लेकिन इंस्टाग्राम और गेमिंग ऐप्स पर बच्चों की भीड़ है। न तो घर में संवाद बचा है, न स्कूल में संवेदना।
खासकर किशोरावस्था की दहलीज पर खड़े बच्चे सामाजिक माध्यमों से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। वे अपने आदर्श अब माता-पिता या शिक्षकों में नहीं, बल्कि इंटरनेट के ‘इन्फ्लुएंसर्स’ में ढूंढते हैं। फैशन, नशा, अश्लीलता और आक्रामकता जैसी चीजें सहजता से उनके स्वभाव का हिस्सा बनती जा रही हैं। संस्कारों की जगह ‘ट्रेंड्स’ ने ले ली है।
इस विकृति का एक और बड़ा कारण है पारिवारिक संरचना में आई गिरावट। संयुक्त परिवारों का टूटना, माता-पिता की व्यस्तता, और संवादहीनता ने बच्चों को मानसिक रूप से असहाय बना दिया है। वे भटकते हैं, क्योंकि उन्हें दिशा देने वाला कोई नहीं होता। वे बहकते हैं, क्योंकि उन्हें समझने वाला कोई नहीं होता।
तकनीक ने छीना ठहराव
जहाँ एक ओर तकनीक ने बच्चों को जानकारी और अवसर दिए हैं, वहीं दूसरी ओर उसने उनका बचपन छीन लिया है। दो साल का बच्चा मोबाइल चलाना सीख जाता है, लेकिन चार साल का होते-होते वह पेड़ पर चढ़ना भूल जाता है। खेल अब स्क्रीन पर होते हैं, और दोस्ती ‘ऑनलाइन स्टेटस’ से मापी जाती है। यह नकली जुड़ाव बच्चों के भीतर गहराई से खालीपन भर रहा है। कबड्ड़ी, गुल्ली डंडा, ऊंची कूद,बेस बाॅल, आदि खेल इनकी जिंदगी से विलुप्त हो गए हैं।
पारिवारिक संवाद का अभाव
आज के माता-पिता सामाजिक रसूख, एवं समाज में अपने को बेहतर दिखाने के चक्कर में बच्चों को ‘टॉप रैंक’ दिलाने में तो दिन-रात एक कर देते हैं, लेकिन उनके मन की बात सुनने का वक्त नहीं निकाल पाते। भावनात्मक जुड़ाव की जगह उपलब्धियों का बोझ दे दिया गया है। बच्चा पढ़ तो रहा है, लेकिन समझा नहीं जा रहा। वह नंबर लाने की मशीन बन रहा है संवेदनशील इंसान नहीं। जिसके परिणाम सभी के सामने है ।
शिक्षा बनाम संस्कार
शिक्षा प्रणाली बच्चों को प्रतिस्पर्धा में धकेल रही है, लेकिन उन्हें संयम, सहनशीलता और करुणा जैसे गुणों से वंचित कर रही है। नैतिक शिक्षा केवल पाठ्यक्रम में सीमित रह गई है — व्यवहार में नहीं। यही कारण है कि आज छोटी उम्र में ही बच्चे आक्रामक, चिड़चिड़े और झगड़ालू होते जा रहे हैं। इसी कारण कम उम्र के बच्चे क्राइम की तरफ़ बढ़ जाते हैं जो बाद में समाज के लिए खतरा पैदा करते हैं।
यह वक़्त है संज़ीदा होने का
समाज, परिवार, स्कूल — सभी को एकजुट होकर इस बहकते बचपन को सँभालना होगा। बच्चों को डिजिटल दुनिया से निकालकर संवेदनशील, सृजनशील और संजीदा वास्तविकता से जोड़ना होगा। नैतिक शिक्षा, खेलकूद, कला-संस्कृति और खुला संवाद — ये सारे उपाय फिर से सक्रिय करने होंगे।
बचपन अगर बहक गया, तो भविष्य भटक जाएगा। आइए, हम सब मिलकर इस मासूम उम्र को फिर से उसकी सही दिशा दें — ताकि एक सशक्त, संस्कारी और समर्पित पीढ़ी देश को मिले।
समाधान की राह
अब सवाल है: क्या हम इस बहकते बचपन को फिर से सँभाल सकते हैं? उत्तर है — हाँ, बशर्ते हम सचमुच खुद बदलना चाहें।
घर में संवाद का माहौल बनाना होगा — हर दिन बच्चों से खुलकर बात करनी होगी।
मोबाइल और स्क्रीन टाइम को सीमित कर, बच्चों को प्रकृति और खेल से जोड़ना होगा।
स्कूलों में अंकों के साथ-साथ भावनात्मक शिक्षा पर भी जोर देना होगा।
और सबसे ज़रूरी — बच्चों को ‘सुनना’ होगा, ‘समझना’ होगा, उन्हें ‘गाइड’ नहीं, ‘साथी’ बनकर जीना सिखाना होगा।
सरकार और सामाजिक संगठनों की भी जिम्मेदारी है कि वे बच्चों के लिए सुरक्षित और प्रेरणादायक माहौल तैयार करें। साइबर सुरक्षा को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जाएँ और बच्चों को डिजिटल दुनिया के खतरों से बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएँ।
आख़िर में यही कहूंगा…
बचपन अगर दिशा में हो, तो देश दिशा में होता है। लेकिन यदि यह भटक गया, तो केवल एक पीढ़ी नहीं, बल्कि पूरी सभ्यता डगमगा जाती है। इसलिए अब वक्त आ गया है — कि हम सब मिलकर फिर से बचपन को बचाएं, इसे बहकने नहीं — खिलने दें। ताकि इसकी ख़ुशबू से सारा जहां महकें।
शेर- क्या हसीं थें वो मेरे बचपन के दिन
लोरियाॅं जब माॅं सुनाया करती थीं
• लेखक संपर्क-
• 94575 30339
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