लघुकथा : सरस सलिला – दीप्ति श्रीवास्तव
▪️
सरस सलिला
– दीप्ति श्रीवास्तव
[ भिलाई, छत्तीसगढ़ ]

गणेश जी का समंदर में विसर्जन कर वर्मा जी वहीं तट पर बैठ गए । कैसे लहरें उठती है फिर गिरती है फिर वापस अपने साथ तट का कचरा समेट कर ले जाती है । यही अनवरत प्रक्रिया चालू रहती है। जैसी हमारे शरीर में दिल अनवरत काम करते रहता है न किसी से लेना न देना वैसे ही ये समंदर अपनी रो में लहरों की गति कायम रखता है । हां पूर्णिमा और अमावस्या को अपने प्रेम का प्रतिदान मांगता है । क्योंकि समंदर केवल लेना जानता है देना नहीं इसलिए तो वह स्वभाव से खारा हो गया है उसके पास प्यासा अपनी प्यास भी नही बुझा सकता। उसके स्वभाव में अपनेपन की कमी और स्वामित्व का भाव ज्यादा है। इस कमी को वह कैसे भी दूर नहीं कर सकता । इसलिए तो कहते है समंदर मत बनो बहने वाली सरस सलिला बनो जिसका मीठा जल सब को तृप्ति देता हैं। नदी बहती है स्थिर नहीं रहती स्थिरता में गति नही होती ।
’स्थिर जीवन में क्या कभी कोई बहार आती सुना है आपने ?’
’नहीं ना ’ स्वयं से प्रश्न और स्वयं ही उत्तर दे रहे थे। चार महीने पहले के एक्सीडेंट ने उसकी सोच बदल दी उनकी मोटरसाइकिल ऑटो से टकराने वाली थी उसको बचाते हुए स्वयं गिर पड़े । वह नीचे मोटरसाइकिल उनके ऊपर सिर चकरा गया दिन में तारे नजर आने लगे । ऑटो वाला सवारी से भरा था उसने उनकी तनिक परवाह न कर आगे चलता बना अपनी सवारी को गंतव्य पर पहुंचना उसकी प्राथमिकता थी कौन गिर रहा है , किस को उसकी गाड़ी ने धकेला उससे कोई लेना देना नहीं था।
’वर्मा जी रोड़ पर बेबस करहाते हुए पड़े थे कोई तो आ जाय मदद करने इतने लोग गुजर रहे हैं आसपास से ’
तभी दो जवान लड़के वहां से निकलते हुए उनको देख रुक गए या तरस खा गए यह तो वही जाने।
’अंकल जी आप पैर नीचे करिए’ पैर तो जैसे जम गया था सीट से पैर उठा उन्होंने ही नीचे किया दोनों ने मिलकर मोटरसाइकिल हटाई उसका दूसरा पांव तो हिलने डुलने में असमर्थ था वह समझ गये उनके पांव में तेज दर्द था सूजन बढ़ते जा रही थी।
’फोन दीजिए ’ उन्होंने अनसुना कर दिया कही स्थिति का फायदा उठा महंगा फोन लेकर नौ दो ग्यारह हो गए तो ….
लड़कों ने बैग से उनका फोन निकाल घर फोन करना चाहा वह लाक था ।
उसकी अंगुली छुआ अनलॉक किया फिर पूछ कर घर फोन किया तब तक एंबुलेंस भी आ चुकी थी घर वालो को सीधे अस्पताल पहुंचने बोल उसे अस्पताल में छोड़ने तक साथ रहे । घर वाले अस्पताल पहुंच चुके थे भरती करने की प्रक्रिया की हड़बड़ी में किसी ने उन लड़कों का मोबाइल नंबर या नाम पता तक न पूछा।
बाद में सबको उनका ध्यान आया । वे उसके लिए देवदूत की तरह आए और चले गए बिना अहसान जताए। एक सच्चे और अच्छे नागरिक का कर्तव्य निभा कर ।
समंदर की खासियत लिए वर्मा जी हमेशा नफा नुकसान की सोच के साथ ही काम करते । उन्हें याद है एक बार पड़ोसी को बुखार में डाक्टर के पास ले जाना था बड़ी विचारशीलता दिखाते हुए अर्जेंट काम है बोल खिसक लिए ऐसे व्यक्ति से कोई उम्मीद भी नहीं करता वही उनकी पत्नी उनसे चोरी छुपे दूसरों की मदद के लिए हमेशा आगे रहती ।
दुर्घटना के उपरांत वर्मा जी में तब्दीली आने लगी
समंदर के बदले नदी बनने की चाह लिए अपने को बदलने की कोशिश में जुट रहते ।
आदतें बदलना बड़ा कठिन होता ।
पुरानी आदतें नई आदतों पर भारी पड़ती दिमाग हिसाब किताब करता पर वही लड़को का उपकार ध्यान आ जाता । फिर अपने आप से लड़ना शुरु करते उन्होंने जद्दोजहद जारी रखी किन्तु अब उनकी पत्नी को छुप कर सहायता करने की जरूरत नहीं पड़ती । मीठा पानी खारे पानी से दोस्ती करने समंदर के रास्ते चल पड़ा यह सोचते हुए संसार में अभी भले लोग बाकी है ।उन भले लोगों में खुद को भी शामिल करना ।
• संपर्क-
• 94062 41497
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)