गज़ल 5 years ago बेहद सहमा सा है आदमी आजकल -डॉ. प्रभा शर्मा 'सागर' बेहद सहमा सा है आदमी आजकल कोरोना की जानलेवा घड़ी आजकल याद परदेश में घर...
कविता बोझ- आख़िर कौन ? – नीलम जायसवाल 5 years ago बचपन में सुना था- लड़कियाँ होती हैं बोझ माँ-बाप पर । उन्होंने मुझे पाला, पढ़ाया, और कर दिया मेरा कन्यादान, मैंने आभार माना। फिर... जीवन...
नव गीत हो असंगत रूप तो – डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ 5 years ago हो असंगत रूप तो उसको गढ़ा जाता नहीं हर चमकती चीज़ को छूने बढ़ा जाता नहीं फल नहीं लगते जहाँ खिलती नहीं हैं टहनियाँ उन...
कविता – यशवन्त सिन्हा ‘कमल’ 5 years ago सामने नहीं आता अब कोई भीम जो करे रक्तपान दुशासन की छाती से चीर दे जांघ दुर्योधन की छेड़ दे युद्ध तुम्हारी अस्मिता की ख़ातिर...
बेटी -निधि सिन्हा 5 years ago क्यों कभी निर्भया तो कभी मनीषा होती हैं बलात्कार का शिकार क्यों हवस पर शिकंजा नहीं, क्यों दुःशासन पर होता नहीं प्रहार. क्यों दब जाती...
कविता, पिता – संतोष झांझी 5 years ago पिता आफिस की फाइलों में दबे फैक्टरी के शोर से थके डाँटते है पिता दोस्तों से गपियाते बेटे को वो देखकर आये हैं फाइल दबाये...
कविता – डॉ.सोनाली चक्रवर्ती 5 years ago जो लोग दंगे करवाते हैं जो लोग मॉब लीँचिंग करते हैं जो लोग बेटियों को कोख में ही मार देते हैं प्रकृति से लड़ लेते...
ग़ज़ल, मौजूदा हालात पर एक ग़ज़ल -मुकुंद कौशल 5 years ago मौजूदा हालात पर एक ग़ज़ल ------------------------------ खुलीं शराब दुकाने,सभी शराब पियो । लुटाप्रदेश बचाने, सभी शराब पियो ।। किसे पता कि खत़्म हो न हो...
कविता महज़ ये वायरस नहीं – गोविंद पाल 5 years ago महज ये वायरस नहीं कब तक भागते फिरोगे अपने आप से, प्रेम की संक्रमण को छोड़ बहुत आगे निकल आये हो लिहाजा कोरोना की संक्रमण...
कहमुक़री (लुप्त होती एक प्यारी सी विधा) – अरुण कुमार निगम 5 years ago (1) जब अपने परिधान उतारे शीश नवाते जन-गण सारे तन को लागे,तन से उज्ज्वल क्या सखि साजन ? ना सखि चाँवल (2) बुरी-भली पहचान बनाए...