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लघुकथा

●भूख तो रोज़ ही लगती है न ●महेश राजा अंतिम नजर बच्चों के टिफिन पर डालकर सुरेखा ने उनकी बेग मे रखे।पानी की बाटल भरदी।अब...

लघुकथा

●याददाश्त और जीवन की कटुता -महेश राजा भाई साहब कह रहे थे,क्या बात है,आजकल कुछ याद नहीं रहता..बात करते-करते भूल जाता हूं.....किसी को बहुत दिनों...

दो लघुकथा – महेश राजा

■आलोचक मित्र मित्र ने मेरी एक सामयिक रचना पर त्वरित टिप्पणी की,-"आजकल खूब अच्छा लिख रहे हो।कथ्य भी अच्छा है,पर संँस्मरण उस पर हावी हो...

लघुकथा, संघर्षशील- महेश राजा

मित्र एक रोज मेरे घर पधारे।मैंनै दरवाजे पर उनका स्वागत किया।रिक्शेवाले को उन्होंने दस रूपये का नोट दिया। रिक्शे वाले ने कहा,-"साहबजी!महंँगाई बहुत बढ गयी...
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