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काव्यकृति ‘लमझना’ : समकालीन हिंदी कविता में अनूठा और दुर्लभ प्रयोग है ‘लमझना’

‘लमझना’ जनजातीय संस्कृति, जीवन दर्शन और परम्पराओं का प्रमाणिक दस्तावेज है- बलदाऊ राम साहू
समकालीन हिन्दी कविता में अनूठा और दुर्लभ प्रयोग है ‘लमझना’* डाॅ चित्तरंजन कर

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ऑनलाइन विमर्श में जनजातीय भावलोक पर केन्द्रित पयोधि की बहुचर्चित प्रयोगधर्मी काव्यकृति ‘लमझना’ की जमकर तारीफ़ की वक्ताओं ने।
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“पयोधि की अनूठी काव्यकृति ‘लमझना’ एक दृष्टि से जनजातीय सांस्कृतिक कोश है। इसके माध्यम से विभिन्न आदिवासी समुदायों की ऐतिहासिक,भौगोलिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को आसानी से समझा जा सकता है।” ये विचार सुपरिचित आलोचक और अध्येता डॉ. गिरिजाशंकर गौतम ने हिन्दी साहित्य भारती छत्तीसगढ़ द्वारा रविवार को प्रतिष्ठित कवि लक्ष्मीनारायण पयोधि की जनजातीय भावलोक पर केन्द्रित काव्यकृति ‘लमझना’ पर आयोजित ऑनलाइन विमर्श के कार्यक्रम में व्यक्त किये।
डॉ. गौतम के अनुसार,’लमझना’ की कविताएँ आदिवासी समाज के उल्लास-उमंग,सुख-दुःख,हर्ष-विषाद,आस्था-विश्वास, स्वभाव और रहन-सहन को पूरी सहजता के साथ व्यक्त करती हैं।उल्लेखनीय तथ्य यह है कि प्रत्येक कविता में प्रयुक्त जनजातीय भाषाओं के शब्दों के अर्थ फुटनोट में दिये जाने के कारण पाठक कविता को समझकर उसका वास्तविक आनंद उठाने के साथ ही नये शब्द भी सीखता है।इसी दृष्टि से ‘लमझना’ जनजातीय संस्कृतिकोश भी है।”
कार्यक्रम के आरंभ में युवा कवयित्री और कार्यक्रम संचालिका श्रीमती निशा साहू की सरस्वती वंदना और संस्था के ध्येयगीत के बाद संयोजक वरिष्ठ साहित्यकार बलदाऊराम साहू द्वारा स्वागत उद्बोधन के साथ ही कृतिकार पयोधि का परिचय दिया गया।उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की पारंपरिक जनजातीय संस्कृति को काव्य विमर्श के साथ प्रस्तुत करने वाली कृति ‘लमझना’ की चर्चा व्यापक स्तर पर हो सके,इस उद्देश्य से ही हिन्दी साहित्य भारती द्वारा यह कार्यक्रम आयोजित किया गया है। उन्होंने कहा कि ‘लमझना’ जनजातीय संस्कृति, जीवन दर्शन और परम्पराओं का प्रमाणिक दस्तावेज है।
प्रसिद्ध भाषाविद और साहित्य मनीषी डॉ. चित्तरंजन कर ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि ‘लमझना’ हिंदी साहित्य का अद्भुत काव्य है। इसमें जनजातीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा का व्यापक संयोजन है। डॉ. कर ने लक्ष्मीनारायण पयोधि के सृजन-संसार पर बात करते हुए उनकी ग़ज़लों पर भी गंभीर विमर्श की आवश्यकता बतायी।उनका कहना था कि पयोधि का विभिन्न विधाओं में उल्लेखनीय कार्य है और सब पर बात की जानी चाहिये।कार्यक्रम में राजस्थान के सुपरिचित बाल साहित्य सर्जक और समीक्षक यशपाल शर्मा ‘यशस्वी’ ने कहा कि ‘लमझना’ से पृष्ठ-दर-पृष्ठ गुज़रते हुए मुझे बार-बार यह अहसास हुआ कि पयोधि जी के रचना-संसार के ज़रिये मैं गहराई में उतरकर भारत को जानने-समझने का प्रयास कर रहा हूँ।जनजातीय मान्यताओं,संवेदनाओं,प्रणयानुभूतियों और पीड़ाओं को जिस आत्मीयता और बारीकी से कवि ने अपने शब्दों से उकेरा है,वह अद्भुत ही नहीं,दुर्लभ प्रयोग है।इसी कवि की बहुत चर्चित और अद्वितीय प्रयोगशील काव्यकृति ‘सोमारू’ से भी अलग।
इस क्रम में विदिशा,मध्यप्रदेश के वरिष्ठ कवि और बाल साहित्यकार राजेन्द्र श्रीवास्तव ने शासकीय सेवकाल के दौरान बस्तर में बीते 22 वर्षों के अनुभव को याद करते हुए कहा कि बस्तर के आदिवासियों का जीवन आत्मसंतोष,समन्वय और सहजता के प्रवाह में बहता चला आ रहा है।ऐसे जीवन से समरस हुए बिना ‘लमझना’ और ‘सोमारू’ जैसी कृतियों का सृजन संभव ही नहीं है।राजेन्द्र जी ने यह भी कहा कि ‘लमझना’ में पयोधि जी ने निश्चय ही आदिम संस्कृति और मौखिक परंपरा को उसके समय के साथ प्रतिध्वनित और प्रतिबिंबित किया है।इस बात की पुष्टि पहली कविता से अंतिम कविता तक आते-आते हो जाती है।उन्होंने इस संग्रह की छंदमुक्त अतुकांत कविताओं की लयात्मकता को विशेष रूप से रेखांकित किया।
इस महत्वपूर्ण विमर्श में बेमेतरा (छत्तीसगढ़) के प्रख्यात साहित्यकार महेन्द्र वर्मा ने अपने प्रभावी वक्तव्य द्वारा यह निरूपित किया कि जनजातीय ‘लमझना’ में आदिम संस्कृति की मौखिक परंपरा में संरक्षित जीवन,अध्यात्म और दर्शन प्रभावी रूप से प्रतिबिंबित है।उनके अनुसार आदिम जीवन की पारंपरिक संस्कृति और उसके भावलोक को अभिनव,किंतु सहज कल्पनाशीलता,तथ्यात्मकता और प्रामाणिक समानुभूति के साथ अभिव्यक्त करने का यह अनूठा प्रयोग जनजातीय जीवन से गहरे रागात्मक संसर्ग के बिना संभव नहीं है।इस दृष्टि से ‘लमझना’ निश्चित रूप से अद्वितीय कृति है।
अंत में कवि पयोधि ने वक्ताओं का का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने कुछ ऐसे बिन्दुओं को भी उजागर किया है,जो कृति के महत्व को प्रतिपादित करते हैं।ऐसा विमर्श कृति और कृतिकार और पाठक – सबके लिये मूल्यवान होता है।कृतज्ञता-ज्ञापन संयोजक बलदाऊराम साहू ने किया।ग़ौरतलब है कि इस ऑनलाइन कार्यक्रम से छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात,महाराष्ट्र सहित विभिन्न राज्यों के 25 से अधिक साहित्यकार और शोधार्थी जुड़े थे।
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