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- मुलाकात और कृति भेंट : डॉ. रजनी नेलसन लिखित कृति ‘निर्झरा’ को मैंने पढ़ा और फिर लिखा कि – “रजनी,तुम ‘निर्झरा’ लिखकर अपने उद्देश्य में सफल हो गई हो एवं एक प्रतिष्ठित लेखिका बन गई हो. मेरी ‘निर्झरा’ नहीं, इस समाज की ‘निर्झरा’ ऊँचाई को छु रही है- प्रदीप भट्टाचार्य
मुलाकात और कृति भेंट : डॉ. रजनी नेलसन लिखित कृति ‘निर्झरा’ को मैंने पढ़ा और फिर लिखा कि – “रजनी,तुम ‘निर्झरा’ लिखकर अपने उद्देश्य में सफल हो गई हो एवं एक प्रतिष्ठित लेखिका बन गई हो. मेरी ‘निर्झरा’ नहीं, इस समाज की ‘निर्झरा’ ऊँचाई को छु रही है- प्रदीप भट्टाचार्य

‘निर्झरा’ की लेखिका डॉ. रजनी नेलसन ने यह पुस्तक मुझे 31मई, 2025 को एक आयोजन में भेंट की थी और आग्रह की थी ‘निर्झरा’ को पढ़कर ही कुछ लिखियेगा. प्रिय रजनी, मैंने पूरी पुस्तक को पढ़ा, भले ही 1 माह लग गए. डॉ. रजनी ने यह पुस्तक अपनी गुरु को गुरुदक्षिणा के रूप में समर्पित की है. ‘चिंगारी तूने दी थी, यह दिल सदा जलता रहा, वक्त कलम पकड़कर, कोई हिसाब लिखता रहा’. जी हाँ वह ‘निर्झरा’ है – ‘स्वयंसिद्धा-ए विज़न विथ-ए मिशन’ की प्रतिभाशाली निदेशक डॉ. सोनाली चक्रवर्ती.

नंद किशोर आचार्य के कहे शब्दों ‘मेरे भीतर एक झरना है और इसी बात का मरना है’. रजनी की ‘निर्झरा’ में डॉ. सोनाली चक्रवर्ती लिखती हैं – यह पंक्तियाँ मेरे भीतर हमेशा गूंजती है, जब मैं खुद को निरंतर चलते देखती हूँ. यह कैसा सुखद आश्चर्य है, जब डॉ. रजनी नेलसन ने किताब लिखी और बिना किसी चर्चा के इसका नाम ‘निर्झरा’ रख लिया. न जाने कैसे!! डॉ. रजनी को बधाई संदेश में डॉ. सोनाली लिखती हैं – जिसके विषय में मैंने अभी तक तो नहीं सोचा और शायद कभी सोचती भी नहीं. मैं खुद को इस लायक आज भी नहीँ समझती हूँ कि मुझ पर किताब लिखी जाए. काम करना अच्छा लगता है इसलिए करती हूँ. ‘निर्झरा’ यूँ ही बहती रहेगी. किताब में सोनाली ने रजनी के साथ बिताए कई प्रसंगों का उल्लेख किया है. मुझे ऐसा लगा कि कौन किसको गुरुदक्षिणा दिया है? लगता है रजनी ने सोनाली को और सोनाली ने रजनी को गुरुदक्षिणा दिया है. तब जाकर बन पाई है ‘निर्झरा’
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‘निर्झरा’ लगभग 150 पृष्ठ में छपी है. कृति के प्रथम खण्ड में ‘ साधारण से असाधारण की ओर’ और द्वितीय खण्ड में ‘कर्तव्य यात्रा’ शीर्षक से प्रकाशित रचनाएँ हैं-
• ‘निर्झरा’: जीवन की अविरल धारा- विचार, वाणी और वाचन की त्रिवेणी
* मानसिक भोजन : पठन और लेखन
• संगीत शाश्वत है, सश्वांस है- अनुभवों की छाया में उजाले की खोज
* अविस्मरणीय पल : अतीत की स्मृतियाँ ही शेष- वो बारिश वाली रात. साड़ी एक, भाव अनेक.
• संस्मरण : सुखद एहसास- एक छत, तीन लड़कियाँ और एक स्वप्निल मेला : ‘रूपाली’ और मेरा किताबों का संसार.
* आत्मबल एवं साहस की परख : कभी हार न मानने का सबब.
• दिलचस्प किस्से : स्कूटर एक, स्मृतियाँ अनेक : साड़ी की स्मृतियाँ, आत्मीयता की परतें.
* अंतदर्द के अंतहीन क्षण : स्थिरता के साक्षी.
• साहसिक निर्णय : जब बेटियां बनी मां की ढाल : परिवर्तन की शुरुवात घर से…
* ममत्व का महत्व : सृजन की साधना और मातृत्व का तेज : शास्वत और मातृत्व.
• पारिवारिक मूल्यों की परख : संबंधों की गहराई और जीवन का संतुलन : रचनात्मक परवरिश की मिसाल : समपरण की प्रतिमूर्ति- संदीप चक्रवर्ती.
* मेरी कहानी, मेरी जुबानी : थोड़ी समझदारी-थोड़ी नादानी.

• एक साहित्यिक आयोजन में डॉ. रजनी नेलसन ने मुझे ‘निर्झरा’ आत्मीयता से सप्रेम भेंट की थी {बाएँ से} कवि त्रयंबक राव साटकर ‘अम्बर’, डॉ. महेशचंद्र शर्मा, डॉ. रजनी नेलसन, ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के संपादक व प्रगतिशील कवि प्रदीप भट्टाचार्य और बांग्ला- हिंदी के कवि प्रकाशचंद्र मण्डल.
• ‘निर्झरा’ के द्वितीय खण्ड में ‘कर्तव्य यात्रा’ शीर्षक से यह रचनाएँ प्रकाशित हुई-
* स्वयंसिद्धा : महिला सशक्तिकरण की मिसाल.
* शाशवत संगीत अकादमी : एक समावेशी सुर-साधना.
* कच्ची धूप-
-एक सृजनशील साधना की अंतहीन कथा.
-सेवा और संवेदना की यात्रा.
-एक सृजनशील आंदोलन.
-मेरा रंगमंच : मेरा स्वाभिमान.
-कार्यशालाओं के आयोजन का उद्देश्य.
* साक्षात्कार के प्रमुख अंश : एक संवेदनशील संवादिनी की दृष्टि से.
डॉ. रजनी नेलसन की किताब ‘निर्झरा’ को पढ़कर मुझे लगा कि जीवन के बीते क्षणों को अपनी डायरी में लिखकर रखना चाहिए ताकि वे बातें कुछ वर्षों बाद जब रिश्ते-नाते, दोस्त-यार छुट जाते हैं, उस डायरी के पन्ने को पलटने से वह यादें ताजा हो जाती है, जैसे कभी-कभी हम एल्बम को निहार लेते हैं. प्रिय सोनाली, की यह कविता मेरे अंतर्मन को छु गई…’एक गृहिणी की कविता’

अंजानी/अनलिखी जाने कबसे/मचल रही है मन से/पन्नों पर छा जाना चाहती है/पर समय ही नहीं मिलता बेचारी को/कुछ ‘नालायक’ शब्द हैं/कुछ खिलंदडे अक्षर हैं/हाथ ही नहीं आते कम्बख्त/उस दिन, रात भर मन में उछल कूद मचाते रहे/सुबह उठी तो तकिये पर बिखरे पड़े थे/उन्हें समेटने को हाथ बढ़ाया ही था/कि हथेली बेटे के माथे से जा लगी/बुखार से तपते माथे पर/’ कविता’ के सारे शब्द सिंक गए/जब तक बेटा चहकने लगा/कविता बिखर गई…
उस दिन भोर की चिड़िया ने मन में गुनगुनाहट भर दी/गीत के बोल सुरों में ढलने ही वाले थे/कि… फोन की घंटी ने अपना हक जमा लिया/ननंद की बेटी की शादी की शहनाई गूंज उठी/ढोलक की थापों पर बन्ने गाते हुए कविता/फिर हाथ से छिटक गई…
देखो ना… कभी गैस खत्म हो गई/सिलैंडर की नाब के साथ घूम गई/कभी तो दाल के साथ पक गई/कभी नई रेसिपी के साथ जल गई/कभी पति के ऑफिस के प्रेजेंटेशन में चली गई.
हाँ… कभी बेटे के स्कूल के प्रोजेक्ट में सज गई/और… जब कभी उसे कान पकड़कर पन्नों में सजाना चाहा/तो खिलखिलाकर हंसने लगी/कहती है अरी… तू तो माँ है/तेरी कविताएँ तो मेरी गोद में चहक रही है.
तू तो गृहिणी है, तेरे शब्दों से सारा घर सजा है/तेरे अक्षरों की झालरें लगी है दरवाजों पर/मन बहल जाता है,पर फिर भी अक्सर/मेज पर पड़ी ‘सखी डॉयरी’ के पन्ने फड़फड़ाते हुए पूछते हैं- क्यों री, हमारी ओर कब देखेगी?
ऐसी कई गृहिणियों की कई डायरियाँ/बच्चों की किताबों में खो गई/घुंघरूओं के जोड़े मायके के सुटकेस के सबसे निचले तह में/मन मसोस कर पड़े हैं…
पेंटिंग की ब्रशेस, ब्लशर और मसकारा की ब्रशेस में/अपना अस्तित्व ढूंढ रहे हैं.
गीत, कहानी के प्लॉट मन में तो आते हैं/पन्नों तक नहीं पहुँच पाते हैं क्यों??? इसलिए कि विवाहित हूँ मैं…
अब हमें सपने देखने का हक नहीं/विवाहित हूँ मैं/न ही प्रताड़ित, न ही पीड़ित हूँ लेकिन/विवाहित हूँ मैं/माता-पिता ने देखे थे मेरे लिए भी कुछ सपने/उन टूटे हुए सपनों से व्यथित हूँ मैं.
विवाहित हूँ मैं
विवाहित हूँ मैं.
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2 जुलाई को जन्मीं डॉ. रजनी नेलसन छत्तीसगढ़ शासन के स्कूल शिक्षा विभाग से शिक्षा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त होकर सामाजिक सरोकारों के कार्यों में जुड़कर अनेक काम कर रही हैं. मैंने रजनी को हमेशा हँसते मुस्कुराते देखा है, यही मुझे प्रभावित करती है. डॉ. रजनी नेलसन की इस किताब को पढ़कर बस मैं एक शब्द में यही कह सकता हूँ कि ‘आप एक संभावनाशील लेखिका हैं’, मेरी अशेष-अनेक शुभकामनाएं है.
– प्रदीप भट्टाचार्य
• संपर्क-
• डॉ. रजनी नेलसन : 99775 26679
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