- Home
- Chhattisgarh
- कहानी : ‘बिना स्त्री का घर’ – डॉ. सतीश ‘बब्बा’
कहानी : ‘बिना स्त्री का घर’ – डॉ. सतीश ‘बब्बा’
▪️
• बिना स्त्री का हर
• डॉ. सतीश ‘बब्बा’
[ चित्रकूट, उत्तरप्रदेश ]

घर – गृहस्थी जो मनुष्य के तन में जन्म लिया है, वह बनाता है। साधु-संत भी झोपड़ी बनाकर रहते हैं। एक प्रसंग आया है कि, एक संत कराही सिर पर ओढ़ रखा था, वह संत कई युगों से कराही में ही बसर किया था जो वर्षा, धूप से बचाव करती थी; उनका नाम ही कराही महाराज पड़ गया था।
जो मनुष्य माया के, दुनियादारी के परिवेश में रहता है वह तो घर बनाने में स्पर्धा करता है; अच्छे से अच्छा घर बनाता है।
रामप्रसाद भी अपना घर बनाया था। कड़ी मेहनत करने में उसे कभी शर्मिंदगी महसूस नहीं होती थी। उसने एक सुंदर गुड़िया सी पत्नी विवाह करके लाया था। दोनों ने मिलकर घर बनाया था। जो सुख – सुविधा रामप्रसाद की गृहस्थी में उपलब्ध रहते थे, अच्छे-अच्छे करोड़पतियों को वह सुख उपलब्ध नहीं होते हैं।
रामप्रसाद सुबह से खेती – बाड़ी के काम निबटाने में लग जाता था। दुपहरी में घर आकर बैठता अपनी पत्नी के काम भी निबटाने में मददगार होता था। फिर दोनों पति-पत्नी साथ – साथ नदी नहाने जाते थे। नहाकर साथ – साथ आते थे।
पत्नी सुबह से घर में क्या है, क्या नहीं है; क्या होना चाहिए, वह कैसे आए घर में फुर्सत नहीं बैठती थी। पत्नी खाना बनाती रामप्रसाद वहीं बैठकर उसकी मदद करने के लिए तैयार रहता था। पत्नी को कोई चीज घटती देखता तो उसे नहीं जाने देता, खुद दौड़कर ले आया करता था। दोपहर में खाना खाने के बाद दोनों दोपहर का आराम साथ में ही करते थे।
दूसरी टाइम रामप्रसाद टंगिए में धार देता, चला जाता था जंगल, जहां से एक बोझ लकड़ियां लेकर आता था। गरीबी में भी शाम रंगीन होती थी।
समय अपनी गति पर चलता रहता है। रामप्रसाद के घर एक लड़के ने जन्म लिया था। बाजे बजाए गए थे, सोहर गीत गाए गए थे। गांव भर की औरतों ने इस खुशी में भाग लिया था।
दिन हंसी – खुशी में बीतते गए थे। शायद भगवान से किसी की खुशियां देखी नहीं जाती हैं। हरी – भरी गृहस्थी थी रामप्रसाद की, सबकुछ ठीक चल रहा था। बेटा भी पढ़ने जाने लगा था।
एक दिन अचानक रामप्रसाद की पत्नी बीमार हो गई थी। तब इतनी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। सड़क भी नहीं थी, बैलगाड़ी से आना – जाना होता था, सड़क मार्ग तक के लिए; फिर शहर के लिए इक्का-दुक्का वाहन मिलते थे। वरना पैदल ही चलना होता था। बैलगाड़ी ही एकमात्र विकल्प हुआ करती थी।
गांव के वैद्य – हकीम सभी ने जवाब दे दिया था। रामप्रसाद किसी तरह से बीमार अपनी पत्नी को शहर ले गया था। शहर में हजारों रुपए खर्च किए थे फिर भी कोई फायदा नहीं हुआ था। आखिर रामप्रसाद की पत्नी रामप्रसाद को अकेला छोड़कर हवा में समाहित हो गई थी। छोटे बच्चे को संभालता रामप्रसाद अपनी पत्नी को गांव ले आया था। उसका अंतिम संस्कार गांव में ही किया था, जिस घर में उसकी यादें थीं।
रामप्रसाद क्या करता, उसे तो पता भी नहीं था कि, घर के अंदर कौन सामान कहां रखा है, क्या, कैसे, कहां रखा जाता है।
बेटा की पढ़ाई भी बंद हो गई थी। गांव में प्राथमिक विद्यालय कक्षा पांच तक ही था; इसके बाद तो छः – सात किलोमीटर दूर कौन भेजता! बेटा को स्कूल के लिए तैयार करना, टिफिन बनाना रामप्रसाद के बस का नहीं था। रामप्रसाद के कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।
बिना स्त्री का घर, रामप्रसाद को काटने के लिए दौड़ता था। जब पत्नी थी तब रामप्रसाद को लगता था कि, घर में बारात के बराबर आदमी भरे हैं। पत्नी के मरते ही घर में श्मशान सा सन्नाटा पसरा हुआ है। रामप्रसाद अर्ध पागल सा हो गया था।
रामप्रसाद के लिए यह बेटा जीने के लिए था। रामप्रसाद बेटे की आड़ में कच्चा – पक्का खाना बना लिया करता था।
रामप्रसाद अब घर के अंदर नहीं बाहर ही बेटे को लेकर चौपाल में सो जाता था। निमंत्रण मिलने पर बेटे को साथ लेकर वहीं से खाना खाकर दूसरे की चौपाल में, पड़ोसी की चौपाल में ही सो जाता था।
चूल्हे की पुताई बंद हो गई थी। बर्तन दो तीन दिन में धो लेता था। घर की रौनक पत्नी के साथ फ़ुर्र हो गई थी। सबकुछ वही था, खेत, बाग – बगीचे; एक पत्नी नहीं थी! रामप्रसाद समय से पहले बूढ़ा दिखने लगा था।
लड़का बड़ा हो गया था। कभी लड़का खाना बनाता, कभी रामप्रसाद! जब जिसको समय मिलता खा लेते थे। कच्चे घर में लिपाई – पुताई बंद हो गई थी। अब रामप्रसाद के दुआरे कोई भी हाल – चाल तक पूछने नहीं आता था। पहले एक – दो आदमी गांव के, बाहर के बने रहते थे।
आखिर एक दिन रामप्रसाद बेटे की शादी का ख्वाब लेकर पड़ोसी की चौपाल में सो गया था। पहले की तरह से रामप्रसाद नहीं जगा था, रामप्रसाद चिरनिंद्रा में सो गया था। पूरे गांव में हल्ला हो गया था कि, रामप्रसाद मर गया है। रामप्रसाद के बेटे का रोते – रोते बुरा हाल हो गया था।
कुछ दिन बाद रामप्रसाद के लड़के की एक अनाथ लड़की के साथ गांव वालों ने शादी करवा दिया था। जिससे रामप्रसाद के घर में अब फिर से दीपक जलने लगा है।
धीरे-धीरे रामप्रसाद के घर की रौनक रामप्रसाद के बेटे की पत्नी के कारण लौटने लगी है। सच कहते हैं, ‘बिना स्त्री का घर, भूतों का डेरा’ होता है!
डॉ. सतीश “बब्बा”
मैं प्रमाणित करता हूं कि निम्नलिखित रचना मेरी अपनी लिखी हुई मौलिक एवं अप्रकाशित है मैंने इसे अन्यत्र प्रकाशनार्थ नहीं भेजा है।
•••
• संपर्क-
• 94510 48508
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)