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- पितृपक्ष पर विशेष [श्रद्धा एवं धर्म] : माता सीता से संदर्भित पवित्र श्राद्ध कथाएं, श्रद्धा दीयते यत् तत् श्राद्धम : श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए वही श्राद्ध है- श्रीमती भावना संजीव ठाकुर
पितृपक्ष पर विशेष [श्रद्धा एवं धर्म] : माता सीता से संदर्भित पवित्र श्राद्ध कथाएं, श्रद्धा दीयते यत् तत् श्राद्धम : श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए वही श्राद्ध है- श्रीमती भावना संजीव ठाकुर
श्राद्ध कर्म के द्वारा पित्रश्रृण से मुक्त हुआ जा सकता है इससे पितृ-गण वर्ष भर प्रसन्न रहते हैं।
जानकी माता सीता द्वारा श्राद्ध की भावपूर्ण कथा प्रचलित हैं-
श्री राम जी द्वारा गया जी के रूद्रपद पर पिंडदान किया गया तब दशरथ जी कृतार्थ हुए और उन्हें रुद्रलोक की प्राप्ति हुई थी उन्होंने श्री राम जी को समस्त अयोध्या वासियों सहित बैकुंठ धाम जाने का वर दिया था ।
माता सीता द्वारा दिया गया श्राद्ध भोज-
एक बार अयोध्या में श्री राम सीता द्वारा श्राद्ध के लिए ब्राह्मण भोज दिया गया , फलस्वरूप दूर दूर से ब्रम्णणों की टोलियां पधारने लगीं।
शिव जी को जब श्राद्ध भोजन के संदर्भ में मालुम हुआ तो वे एक वृद्ध ब्राह्मण का रुप रख कर टोली में शामिल होकर अयोध्या पहुंच गए।
कहां “मुझे भी भोजन कराएं राजन ”
श्री राम जी उन विशिष्ट अतिथि को पहचान गए कि स्वयं शिव शंकर आए हैंलेकिनवहइसदौरान हमारी परीक्षा लेने ।
श्री राम जी ने बड़े सम्मान पूर्वक वृद्ध ब्राह्मण के चरण धुलाकर आसन पर बैठाया ।
उनको भोजन परोसा गया ,छोटे भाई लक्ष्मण जो भी परोसते वृद्ध ब्राह्मण एक ही ग्रास में ग्रहण कर लेते पत्तल में कुछ दिखता ही नहीं ,रुकता ही नहीं ,और भी सभासद आ गये जो पत्तल को भरने लग गए पर पत्तल खाली की खाली ही रहती गई।
दूर खड़े श्री राम जी शिव जी की लीला देख मन ही मन रोमांचित हो रहे थे ।
बात फैलते फैलतै राज महल और माता सीता तक पहुंच गई,रसोई का संपूर्ण संचालन एवं नियंत्रण वे ही देख रही थीं।
एक बूढा ब्राह्मण आया है ,जिसकी पत्तल मे खाना रुकता ही नहीं ,भोजन सामग्री क्षण भर में साफ हो जाती है ।
अब यह भोज प्रतिष्ठा का विषय बन गया ,लिए महल का पूरा भोजन और सामग्री समाप्त होने लगी,पर भगवान शिव शंकर तृप्त नहीं हुए।
सीता माता चिंतित हो गईं तब श्रीराम जी ने माता अन्नपूर्णा पार्वती जी का आवाहन किया कि आप ही भगवान शंकर जी की क्षुधा शांत कर सकती हैं।
सभी परोसने वाले वहां से हटा दिये गए,माता अन्नपूर्णा वहां प्रगट हो गईं।
श्रीराम जी ने माता अन्नपूर्णा से निवेदन किया कि इन्हें आपके अतिरिक्त और कोई तृप्त नहीं कर सकता है
आप ही अपने स्वामी को भोजन कराइये।
अन्नपूर्णा माता ने भोजन पात्र अपने हाथ में लिया वैसे ही वह अक्षय पात्र बन गया अन्नपूर्णा माता विश्वनाथ को भोजन कराने लगीं,पत्तल में एक लड्डू परोसा ,शंकर जी खाते खाते तक गये, लड्डू समाप्त नहीं हुआ,माता ने दोबारा परोसना चाहा तो शंकर जी ने मना कर दिया।
शंकर जी ने डकार ली और हंसकर कहा -“अन्नपूर्णा तुम्हें आना पड़ा,अब मैं तृप्त हो गया।
सीता माता द्वारा श्राद्ध का प्रसंग;-
जब उन्होंने साक्षात दशरथ जी को पितृ भोज करते देखा —
भगवान श्री कृष्ण से पक्षीराज गरूड़ ने पूछा लोग अपने पितर को मिल कर तरह तरह का भोजन कराते हैं, तो क्या उनके पित्र ,देवलोक से मृत्यु लोक में वह भोजन गृहण करने आते हैं?क्या उन्हें कोई देख सकता है।इसका क्या प्रमाण है ।
तब श्री कृष्ण जी ने देवी सीता का प्रसंग सुनाया था।
माता सीता ने पुष्कर तीर्थ में श्राद्ध किया था तब उन्होंने अपने ससुर सहित तीन पितरों को आमंत्रित ब्राह्मणों के शरीर में देखा था।
वह कथा सुने-
पिता की आज्ञा से श्रीराम लक्ष्मण सीता जी वनवास चले गए
उन्हें ज्ञात हो गया था कि दुख में उनके पिता की मृत्यु भी हो गई है।
जब श्री राम जी पुष्कर पहुंचे तो उन्होंने अपने पिता के निमित्त श्राद्ध किया इससे श्रेष्ठ अवसर हो ही नहीं सकता कि पिता का श्राद्ध पुष्कर में हो ।
श्री राम जी ने सभी शाक फल भोजन सामग्री की व्यवस्था की और माता सीता ने रसोई बनाई।
सम्पूर्ण विधी विधान के साथ वहां श्राद्ध हेतु ब्राह्मणों का आवाहन किया गया।
सभी नेआसन गृहण कर लिया ,जो भोजन उपलब्ध था,वह पत्तल में परोसा गया,माता जानकी स्वयं व्यवस्था कर रही थीं ।
अचानक जानकी भोजन करते ब्राह्मण और श्रृषियों के बीच से निकलीं और तुरंत ही दूर चली गईं ,
जाकर वे घनी झाड़ियों लताओं के पीछे छिपकर बैठ गईं,यह सभी कृत्य श्री राम जी देख रहे थे ,उन्हें आश्चर्य भी हुआ ,वे ब्राह्मण, ऋषियों के भोजन सम्पन्न होने की प्रतीक्षा कर रहे थे।
भोजन उपरांत श्री राम ने जानकी माता से बोले -हे सीते तुम्हे तो मालुम है, कि ब्राह्मण,ऋषियों के रुप में स्वंय पितृ भोजन करते हैं ,फिर तुम अचानक वहां से कैसे आ गईं,कुछ कमी हो जाती टू वे रुष्ट हो सकते थे ?
तब रुंधे गले से माता जानकी ने बहुत ही भावुक करने वाला जबाब दिया -वहां उपस्थित ब्राह्मण एवं ऋषियों के बीच मैने
दो महापुरुषों को देखा जो राजसी वेषभूषा में सजे धजे थे ,तभी मैंने आपके पिता जी के दर्शन किये,वे भी सभी राजसी वस्त्र आभूषण से सजे हुए थे।
तभी मुझे लज्जा का बोध हुआ ,और मन में कुछ और भी आया
उसी क्षण मैंने निश्चय किया,
हे प्रभू ,मैं इन सन्यासी वस्त्र,पेड़ की छाल,मृघचर्म धारण करके अपने ससुर के सम्मुख कैसे जा सकती हूं? जो भोजन हम परोस रहे थे ,वह तो राजा दशरथ के दास भी नहीं स्वीकार करते ,
मिट्टी और पत्ते के दोने में वह भोजन कैसे दे सकती थी ?
मैं तो अभी भी अपने ससुर की वहीं राजकुमारी लाडली बहू हूं,जो हमेशा स्वर्ण आभूषणों से कीमती वस्त्रों से सुसज्जित महारानी हूं।
आज मैं अपनी इस अवस्था में उनके सामने कैसे जाती ,उनके मन को कितना क्षोभ पहुंचता ,मै उनके मन को दुख नहीं पहुंचा सकती थी , अतः मैं शीघ्रता से उनकी नजरों से दूर होकर , लताओं की ओट मे छुप गई ।
तब गरुण जी संतुष्ट हुए कि पित्र मृत्यु लोक में आकर अपना भोजन गृहण करते हैं।
सीता माता द्वारा फल्गु नदी आदि को दिया गया श्राप – कथा –
एक बार वनवास के समय श्रीराम लक्ष्मण एवं सीता जी गया जी तीर्थ पहुंचे उन्होंने पिता दशरथ के लिए श्राद्ध हेतु ब्राह्मणों से निवेदन किया ।
फलस्वरूप श्री राम लक्ष्मण श्राद्ध सामग्री एकत्र करने वरेण्य चले गए ,माता सीता उनकी राह देखते फल्गु नदी तट पर बैठी थीं,जब काफी समय बीत गया दैपहर हो गई,श्राद्ध का समय बीतने लगा तब माता सीता ने ब्राह्मण जी के कहने पर अपने ससुर का श्राद्ध कर दिया ।
जब श्री राम लक्ष्मण सामग्री लेकर लौटे तो उन्हें ज्ञात हुआ श्राद्ध तो हो गया है और दशरथ जी ने स्वीकार कर लिया है। श्री राम जी क्रोध में आ गए थे कि बिना सामग्री बिना पुत्र के द्वारा पिता का श्राद्ध कैसे हो सकता है ? माता सीता ने पांच सबूतों को प्रस्तुत किया जो उस घटना के समय उपस्थित होकर श्रद्धा को देख रहे थे वे थे फल्गु नदी,कौआ, ब्राह्मण,गाय ,तुलसी पौधा और बरगद का पेड़ ।
श्री राम जी के क्रोध को देखकर फल्गु नदी, कौआ,तुलसी पौधा,गाय,ब्राम्हण ने झूठ बोला उन्हें नहीं पता कि श्राद्ध हुआ कि नहीं ।
सिर्फ बरगद के पेड़ ने ही कहा- हां माता सीता ने श्राद्ध किया है और दशरथ जी ने उसे सहर्ष स्वीकार किया है।तब सीता माता ने उन पांचों को झूठ बोलने पर श्राप दिया -फल्गू नदी केवल नाम की नदी रहेगी जिसमे पानी नहीं रहेगा ।
कौआ -हमेशा लड़ते-झगड़ते रहेगा भोजन के लिए।
गाय -केवल उसके पिछले भाग को पूजा जाएगा उसे अपनीहीभोजन के लिए भटकना पड़ेगा।
ब्राह्मण -इनको जितना भी मिले कभी सतोष नहीं होगा ।
तुलसी का पौधा कभी गया में नहीं पनपेगा ।
बरगद के पेड़ को दीर्घायु होने का वरदान मिला ,सती महिलाएं अपने सौभाग्य के लिए बरगद की प्ररिक्रमा करेंगी ,बरगद की छाया लोगों को सुकून देगी ।
इस तरह सनातन धर्म में देवी माता-सीता के समय से श्रृद्धा पूर्वक श्राद्ध करने की प्रथा चली आ रही है।

[ • श्रीमती भावना संजीव ठाकुर : छत्तीसगढ़-रायपुर ]
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