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संस्मरण : बड़े पापा… मैं आ गई हूँ – कैलाश जैन बरमेचा

नारी सशक्तिकरण की राह- कोमलता के भीतर की कोठरता : शादी के बाद भी रुखसाना रुकी नहीं. नौकरी,पढ़ाई, सब इंस्पेक्टर की तैयारी-सब साथ में…
दुर्ग की एक शांत, ठहरी हुई शाम थी।
आसमान हल्का धुँधला था, जैसे किसी ने नीली चादर पर चुपचाप धूल बिखेर दी हो।
रमेश अपनी दुकान में बैठे थे—पर आज किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था।
मन बेचैन था, आँखें बार–बार उसी दरवाज़े की ओर उठ जातीं।
तभी मोबाइल की स्क्रीन चमकी—
“रुखसाना कॉलिंग…”
फ़ोन उठाते ही उधर से वही मधुर, कोमल, अद्भुत स्नेह से भरा स्वर आया—
“बड़े पापा… मैं आ रही हूँ।”
बस इतना सुनना था कि रमेश के भीतर कोई दीप जल उठा।
उसके शब्दों में इतनी सौम्यता, उतना अपनापन…
मानो उसने आवाज़ नहीं, अपनी आत्मा का एक हिस्सा भेज दिया हो।
रमेश बार–बार दुकान के बाहर झाँकते।
हर धीमी गाड़ी, हर रुकते वाहन में उन्हें उसकी आहट सुनाई देती।
लेकिन वह उस दिन नहीं आई।
उन्होंने खुद को समझाया—
“कोई परेशानी आ गई होगी… पर उसने कहा था ‘बड़े पापा मैं आ रही हूँ’… बस यही काफी है।”
पूरी रात उसके शब्द कानों में गूँजते रहे।
रमेश को पहली बार अहसास हुआ कि
कुछ रिश्ते खून से नहीं — दिल से जन्म लेते हैं।
🌼 रुखसाना का सौम्य संस्कार — अम्मी जान की देन
रुखसाना कोई साधारण लड़की नहीं थी।
उसकी मुस्कान में कोमलता, बातचीत में तहज़ीब,
चलने में नज़ाकत और स्वभाव में ऐसी मिठास थी
जो विरासत में ही मिल सकती है।
उसकी अम्मी जान—
एक बेहद सौम्य, सरल, खूबसूरत और संस्कारी महिला।
उनकी आँखों की शांति, उनकी भाषा की मिठास,
उनकी दुआओं का असर—
सब रुखसाना में घुला हुआ था।
यही कारण था कि बैंक की नौकरी करते हुए
रुखसाना की पहचान काम से नहीं, स्वभाव से बनती थी।
🌸 पहली तनख़्वाह — वह दृश्य जिसने रमेश को पिता बना दिया
रमेश ने हल्के मज़ाक में उससे कहा था—
“देख बेटा… पहली तनख़्वाह अपने बड़े पापा को देना।”
और उसने मुस्कुराकर सिर हिला दिया था।
कुछ महीने बाद…
वह सच में पहली तनख़्वाह लेकर आई।
कदमों में हिचक, आँखों में आदर,
और वही मधुर आवाज़—
“बड़े पापा… मैं आ गई हूँ।”
रमेश भावुक हो उठे।
उसकी हथेली में रखी तनख़्वाह ली नहीं—
बल्कि उल्टा अपने पैसे जोड़कर उसके बटुए में रख दिए।
“मुझे तेरे पैसों की ज़रूरत नहीं बेटा…
मुझे तुझे आगे बढ़ाना है।”
उस दिन रुखसाना की आँखों की चमक
रमेश के लिए किसी भी धन से बड़ी थी।
💞 आदिल और रुखसाना — एक सम्मानभरा रिश्ता
बैंक में ही उसकी मुलाक़ात हुई आदिल से।
सच्चा, ईमानदार, जिम्मेदार लड़का।
रुखसाना के स्वभाव, उसकी मेहनत और संस्कारों से प्रभावित।
धीरे–धीरे दोनों के बीच सम्मान बढ़ा, बातचीत बढ़ी… और रिश्ता बन गया।
जब घरवालों ने बात की तो रुखसाना ने एक ही बात कही—
“बड़े पापा हाँ कहेंगे तभी यह रिश्ता आगे बढ़ेगा।”
ये शब्द रमेश के दिल में फूल की तरह गिरे।
उन्हें लगा—
यह रिश्ता खून का नहीं,
पर खून से भी अधिक अपना है।
मुहूर्त निकला, फेरें पड़े,
दोनों जीवनसाथी बन गए।
🔥 नारी–सशक्तिकरण की राह — कोमलता के भीतर की कठोरता
शादी के बाद भी रुखसाना रुकी नहीं।
नौकरी + पढ़ाई + सब-इंस्पेक्टर की तैयारी—
सब साथ में।
और जब उसका चयन सब-इंस्पेक्टर में हुआ
और वह पहली बार वर्दी पहनकर
रमेश के सामने आई…
उसने कदम रखते ही कहा—
“बड़े पापा… मैं आ गई हूँ।”
रमेश की आँखें भर आईं—
“आज तूने मेरी जिंदगी की कमाई लौटा दी बेटा।”
ड्यूटी पर रुखसाना
गरीबों के लिए कोमल,
पीड़ितों के लिए सहारा,
और अपराधियों के लिए कड़क दीवार बन गई।
अंदर का दिल अम्मी जान जैसा कोमल,
बाहर वर्दी जैसा कठोर।
यही तो सच्ची नारी–सशक्तिकरण है।
🌧️ दूरी — रमेश और अब्दुल के बीच की खामोशी
अब्दुल अपने कार्यक्रमों में व्यस्त,
रमेश अपने व्यापारों में—
दूरी बढ़ने लगी।
बातें कम, मुलाकातें कम…
और यादें ज़्यादा।
रमेश इस अकेलेपन में घिरने लगे।
धीरे-धीरे डिप्रेशन ने उन्हें जकड़ लिया।
🩺 बीमारी, डिप्रेशन और डॉक्टर की सलाह
एक दिन रमेश बिस्तर पर गिर पड़े।
डॉक्टर ने जाँचकर कहा—
“इनको मानसिक तनाव है… वातावरण बदलना बहुत ज़रूरी है।
अगर कुछ दिन पहाड़ों में रहें,
तो स्वास्थ्य सुधर सकता है।”
रमेश के मन में एक ही नाम गूँजा—
“रुखसाना…”
और रुखसाना ड्यूटी के बीच
भागते–भागते पहुँच गई।
दरवाज़ा खोलते ही बोली—
“बड़े पापा… मैं आ गई हूँ।”
❄️ कश्मीर — जीवन का नया जन्म
रुखसाना ने छुट्टी मिलते ही
रमेश को कश्मीर ले गई।
डल झील की ठंडी हवा,
बर्फ से ढके पहाड़,
झेलम का मधुर संगीत…
68 साल की उम्र में
रमेश ने पहली बार जीवन का असली आनंद महसूस किया।
वह बार–बार कहते—
“बेटा, मुझे तो लगता है मैं फिर से जवान हो गया हूँ…”
डॉक्टरों ने बताया—
जहाँ रमेश के पास सिर्फ कुछ महीनों की उम्मीद थी,
इस यात्रा, इस सेवा, इस प्यार ने
उनकी जिंदगी पूरे दो साल बढ़ा दिए।
🤝 रुखसाना — वह सेतु जिसने दो दिलों को मिला दिया
इन दो सालों में
रुखसाना ने रमेश की दुनिया फिर से बसा दी।
ड्यूटी के बाद
कभी अपने अब्बू के घर,
कभी अब्दुल के पास,
कभी रमेश के पास—
हर जगह उसकी जरूरत थी।
पर जब रमेश की हालत और बिगड़ी,
रुखसाना ने सबसे पहले अब्दुल को फोन किया—
“अब्बू… बड़े पापा बुला रहे हैं।
चलो, समय बहुत कम है।”
और जब अब्दुल कमरे में आया,
रमेश की आँखों में शांति उतर गई।
दोनों में जो दूरी थी,
वह रुखसाना ने पल भर में मिटा दी।
🌅 अंतिम सुबह — अंतिम आवाज़
एक शांत, उजली सुबह…
रमेश ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।
कमरे में वही सुरीला स्वर गूँजा—
“बड़े पापा… मैं आ गई हूँ।”
रमेश मुस्कुराए…
हथेली बढ़ाई…
और शांत सांस लेते हुए बोले—
“अब मैं निश्चिंत हूँ बेटा…
तू मजबूत है…
मैं जा रहा हूँ…”
उनके चेहरे पर मुस्कान थी।
जैसे कह रहे हों—
“जिंदगी तुमने पूरी कर दी, रुखसाना…”
🌷 कहानी का संदेश
रिश्ते खून से नहीं बनते—
दिल से बनते हैं।
निष्ठा, सेवा, सम्मान और प्रेम से बनते हैं।
रमेश ने केवल एक रिश्ता नहीं निभाया—
उन्होंने एक जीवन बनाया।
और रुखसाना ने अपनी कोमलता,
अपनी वर्दी की कठोरता,
अपनी सेवाभावना
और अपने अमर प्रेम से
उस रिश्ते को देवत्व दे दिया।
कुदरत हमे धरती पर उतारती है—
पर रिश्ते हम स्वयं बनाते हैं।
अगर मन पवित्र हो,
तो गैर भी सगे बन जाते हैं…
और कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं
जो जीवन नहीं—
मृत्यु के बाद भी नहीं टूटते।
क्योंकि वे शुरू ही होते हैं
एक आवाज़ से—
“बड़े पापा… मैं आ गई हूँ…

👉 • कैलाश जैन बरमेचा समाजसेवी, उद्योगपति के साथ-साथ साहित्यिक चिंतक भी हैं.
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