विशेष : महेश राठौर ‘ मलय ‘ [जांजगीर छत्तीसगढ़]
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हिंदी {आल्हा छंद}
बहुत लचीली हिंदी भाषा,
महिमा जाई नहीं बखान।
अक्षर-अक्षर मिश्री जैसे,
सबसे सुंदर मधुर जबान।
देवनदी-सी कल-कल बहती,
अनगिन नदियाँ अंक समेट।
व्यंजित होती मुख-यंत्रों से,
बिना किसी-भी लाग-लपेट।
सरला भी है, तरला भी है,
तन्वंगी – सा रूप अनूप।
रुचिरा, मृदुला, शुभदा, सुखदा;
छाँव यही है, यह ही धूप।
शिरोरेख में अक्षर – अक्षर,
ग्रंथित होकर बनते हार।
ज्ञान-लोक के महायज्ञ के,
मानो लगते वंदनवार।
आगे – पीछे, ऊपर – नीचे;
मात्राएँ लग, कर श्रृंगार।
व्यंजन – व्यंजन सुघर बनातीं,
गहने बनकर विविध प्रकार।
संत कबीरा, सूरदास जी,
तुलसी, मीरा और प्रसाद।
पंत, गुप्त, धर मुकुट, निराला,
बच्चन पूजे तेरे पाद।
गीत महादेवी वर्मा के,
बरबस आते सबको याद।
लिखी वेदना मीरा बनकर,
करके गिरधर से संवाद।
देवनागरी! सरस्वती माँ,
सृजन हेतु हो तुम वरदान।
प्रचुर बढ़ायेंगे संतानें,
मिलकर हम सब तेरा मान।
•संपर्क –
•81094 70546
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chhattisgarhaaspaas
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