लघु कथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय

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• पायल

रमेश अपनी गर्लफ्रेंड मोना के साथ काॅफी हाऊस में कोने की सीट पर बैठा वेटर का इंतजार कर रहा था तभी उसके मोबाइल की घंटी बजी। पिता का नम्बर देखते ही वह मोना को वहीं छोड़ थोड़ा दूर जाकर बातें करने लगा। पिता ने कहा- बेटा कल तूं बोल रहा था कि लाॅकटेबल खरीदने के लिए पांच हजार रूपया चाहिए। ये कैसा टेबुल है इतना मंहगा? घर में एक टेबुल पड़ा है उसी को ले जा। रमेश ने पिता को समझाया, लाॅकटेबल साइंस की चीज है। उसके बिना साइंस की पढ़ाई नहीं हो सकती। पिता ने गंभीर होकर कहा- पिछले महीने राई बेचकर तुम्हें पैसे भेजा था। अब मेरे पास पैसे नहीं हैं। अगर बहुत जरूरी हो तो तुम्हारी मां की पायल बेचकर भेजता हूं। इस समय चांदी का अच्छा भाव मिल जाएगा। रमेश ने कहा- ठीक है किसी तरह भेजिए बहुत जरूरी है, जब नौकरी लगेगी तो सबसे पहले मां के लिए पायल ही बनवाऊंगा। एक सन्नाटे के बाद फोन कट गया। जब रमेश टेबुल पर लौटा तो काॅफी आ चुकी थी । मोना ने कहा- किसका फोन था रमेश। अरे! पापा का फोन था। हरदम चिंतित रहते हैं। कह रहे थे पैसे की चिंता मत करना नि: संकोच मांग लेना। खाने पीने का ध्यान रखना। मोना ने पूछा तुम्हारे पापा क्या करते हैं? अरे! वे जमींदार हैं। हमारे बड़े बड़े फार्महाउस हैं। पिता जी को नौकरी करने की क्या जरूरत। एक मैनेजर रख छोड़ा है वही सब देख भाल करता है।मोना ने कहा अच्छा ये बताओ अगले वीकेंड पर कहां चलना है? मुस्कुराते हुए रमेश ने कहा,तुम जहां कहो। काॅफी की आखिरी घूंट कप में ही छोड़ते हुए रमेश पेमेंट के लिए काउंटर की ओर बढ़ा, उधर पिता ने सकुचाते हुए पत्नी से कहा- इस समय हाथ बहुत तंग है। रमेश के लिए पैसा भेजना है। पैसा नहीं भेजा तो पढ़ाई का बहुत हर्जा होगा। अगर तुम बुरा न मानो तो अपनी पायल दे दो पैसे आते ही बनवा दूंगा। रमेश की मां के हाथ पायल के कुंदे पर थे और रमेश के हाथ मोना के हाथ में , दोनों अगले वीकेंड की प्लानिंग करते हास्टल की ओर बढ़ रहे थे।
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• बाड़े की बकरियाँ

साहित्यिक संगठन जब बने होंगे तो निश्चित ही उनका उद्देश्य बड़ा पवित्र रहा होगा। साहित्यकारों को मंच मिलने से साहित्यकार और साहित्य दोनों को सुरक्षा और संरक्षा मिलने लगी। साहित्य और विचारधारा की पहुंच सर्वसाधारण जनता तक हुई। साहित्यकार किसी अन्य ग्रह का प्राणी न होकर सर्व साधारण हो गया। नव उदित मंचों का शुरुआती दौर तो स्वर्ग काल कहा जा सकता है लेकिन धीरे-धीरे ये मंच गोलबंदी का स्वरुप लेने लगे। साहित्य गौड़ और विचारधारा प्रधान हो गई। रचनाओं में दुहराव दिखने लगा। विचारधाराओं के अपने बाड़े हो गए। हर बाड़े के कुछ मालिक और कुछ लठैत रखवाले बन गए। साहित्यकार छोटे-छोटे गुटों में बंटी गए। एक बाड़े की बकरी दूसरे बाड़े में प्रवेश नहीं पा सकती है। सबकी नस्ल अलग,बाड़ा अलग। सब काशी के दगुआ सांड हो गए। सबके दागने वाले अलग-अलग। सब अपने अपने पुट्ठा पर अपना-अपना ब्रांडनेम लेकर घूमने लगे,जो अनजान लगा घुपेट दिया।यहीं से दुर्भाग्य का उदय हुआ। एक समय था जब साहित्यकार सिर्फ साहित्यकार होता था । परस्पर सम्मान था। अब तो साहित्यकारों की हालत छोटे बच्चों से भी बत्तर हो गई है। अगर तू उससे बोलेगा तो मैं तुझसे नहीं बोलूंगा,कट्टी। क्या ऐसी सोच से समाज कल्याण सम्भव है। जो स्वयं एक नहीं है वो किसको जोड़ने का ढोंग कर रहा है। दिशाहीन से कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वो समाज को दिशा देगा? आज तो हालत यह है – “परस्परम प्रशंसंति अहो रूपम् अहो ध्वनि:।” ऊंट का विवाह था ,गदहे बाराती थे। गदहे ने ऊंट से कहा- “भाई आज तो तुम बहुत खूबसूरत दिख रहे हो।” ऊट ने कहा- “गदहे भाई आपका गला बहुत ही सुरीला है ,आपको एक गाना तो सुनाना ही होगा।” आज यही चल रहा है,जो चिंता का विषय है।
[ • प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेम कुमार पाण्डेय केंद्रीय विद्यालय सरायपाली छत्तीसगढ़ में पदस्थ हैं. ]
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