‘आरंभ साहित्यिक मंच’ : हरि प्रकाश गुप्ता ‘सरल’

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• हरि प्रकाश गुप्ता ‘सरल’
[ • इंजीनियर हरि प्रकाश गुप्ता ‘सरल’ की एकल काव्य संग्रह चार और लगभग 70 से अधिक साझा संकलन में कविताएं प्रकाशित हुई है. • रुचि है- लिखना पढ़ना और कवि सम्मेलन में अपनी रचनाओं की प्रस्तुति देना. • ‘सरल’ कहते हैं- हमारे शब्द ही हमारे कर्म होते हैं, हमें अपने हर शब्द को बोलने के पहले तौलना बहुत जरूरी होता है. हम जो रचना का सृजन करते हैं, उन शब्दों से हमारी भावनाओं का पता चलता है. • ‘सरल’ की कविताओं में शब्द चेतना दिखती है, मुझे इनकी कविताओं में सुदृढ़ प्रगतिशील परिप्रेक्ष्य दिखता है. इनकी कविताओं में घर-पड़ोस से लेकर देश-परदेश सांस लेते हैं. • सम्मानों की लंबी फेहरिस्त के कवि ‘सरल’ वाकई में ‘सरल’ शब्दों में कठिन प्रश्न पाठकों को छोड़ जाते हैं. • आप भी पढ़ें और कुछ शब्दों से हमको भी अवगत कराएं. – संपादक ]
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• मैं लाया हूँ दिल अपना

मैं लाया हूं दिल अपना
हसीनों से संभाल के।
रखना मेरी बीबी तुम
इसको संभाल के ।।
मैं लाया हूं दिल अपना
हसीनों से संभाल के।
रखना मेरी बीबी तुम
इसको संभाल के ।।
खूबसूरत जुल्फों , हसीन बाहों से
बचना आता है न मुझे ।
सिखा सको बचना तो
देता हूं काम ये तुझे ।।
वरना मुश्किल लगता है
बचकर उनसे निकलना ।
मैं तो संभल रहा हूं
तूम भी संभालना ।।
फिर दोष न देना
क्यों बताया है नहीं ।
अब तुम ही सोच तरीका
तेरा क्या है सही ।।
लाया हूं दिल अपना
मैं हसीनों से संभाल के।
रखना मेरी बीबी तुम
इसको संभाल के ।।
मैं लाया हूं दिल अपना
हसीनों से संभाल के ।
रखना इसे तुम
बीबी मेरी संभाल के ।।
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• चल उड़ जा रे

चल उड़ जा रे “ईमान”
यहां नहीं कोई तेरा काम
दूर हुये सब अपने तेरे
हो गये सब बेईमान
कोई न तेरा , न कोई मेरा
कोशिश सब बेकार
पैसे के सब सगे संबंधी
रिश्ते नाते न कोई समझे
बेईमानों की जय जयकार
चल उड़ जा रे , ईमान
यहां नहीं कोई तेरा काम
सुबह दोपहर और शाम को
रोटी की तकरार
रोजी ईमान की मिलती नहीं
हो गये सब बेकार
झूठ बोल कर जो भी चलता
जाता सबसे आगे
कुछ भी यहां मिलता नहीं
किसी को किसी से बिन मांगे
मांग मांग कर ले भी ले तो
सब आ जाते छीनने आगे
अब किस किस से बचता रहूं
भागे भागे
चल उड़ जा रे , ईमान
यहां नहीं कोई तेरा काम।
दूर हुये सब तेरे अपने
हो गये सब बेइमान।
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• चपन वाले दोस्त

बचपन वाले दोस्त कहां और कैसे पाऊं ।
बचपन बाले बीते दिन अब कैसे वापस लाऊं ।।
बचपन वाले खेल जो खेले आज कैसे आएंगे।
वो कांच के कंचे और गुलेल खिलौने कहां से पाएंगे।।
बचपन वाली वो गांव की गलियां सड़कों में बदल गई ।
वो छोटी छोटी सी खूबसूरत झोपड़ी मकानों में बदल गई।।
मीठा पानी देने वाला सुरई का कुआं नहीं बचा है।
कुछ बचपन के दोस्त खो दिए कुछ ने इतिहास रचा है।।
बचपन वाली सारी हरकतें याद बहुत आती हैं।
बचपन वाले सारी की सारी यादें बहुत सताती हैं।।
बचपन वाले दोस्त कहां और कैसे पाऊं।
बचपन बाले बीते दिन अब कैसे वापस लाऊं ।।
बचपन वाला स्कूल की इमारत सपनों में आज भी आती है।
स्कूल में गुरुजी से हुई पिटाई की याद आज भी न जाती है।।
सकूर भाई के हाथों से बनी पतंगें उड़ाते।
स्कूल से आकर झटपट पहाड़ी पर चढ़ जाते।।
कटी पतंगें को पकड़ने के चक्कर में जमीन पर गिर जाते।
मांझा से हाथ की ऊंगली का कट जाना पतंग उड़ाते उड़ते।।
कार्तिक मास में गांव में लगने वाले मेले में जाना।
तरह-तरह के खाने वाली चीजों को मेले में खाना।।
मेले में सर्कस का लगना याद बहुत आता।
सर्कस का जोकर अपने जोकरपन से बहुत हंसाता।।
मोटरसाइकिल का “मौत के कुएं में”
चलना अच्छा लगता।
अजब-गजब का बहुरूपिया जब
अलग -अलग रूप बदलता।।
दादी और नाना से सुनी कहानियों की आवाज
आज भी कान में आती है।
बचपन के दोस्तों की शैतानियां की आज भी
याद बहुत सताती है।।
बचपन वाले दोस्त कहां और कैसे पाऊं ।
बचपन बाले बीते दिन अब कैसे वापस लाऊं ।।
[ • छत्तीसगढ़-भिलाई निवासी हरि प्रकाश गुप्ता ‘सरल’ छत्तीसगढ़ विद्युत मंडल में अभियंता पद रहे. ]
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