पावस रचना : दीप्ति श्रीवास्तव

▪️
• सावन

बचपन की यादें जब भी आती
संग सावन की बूंदे मुस्काती
भीग-भीग मन हरियाता
छूटा अल्हड़पन फिर लहराता।
वो कागज की नाव तैराना ,मिट्टी में रपटना
बारिश में भीगना ,था असीम सुखानंद।
न चिंता कल की, न दौलत का मेल,
हर पल था जीवन एक खेल
खेल खेल में जीवन बीता
फिर जेब भरने का दौर जीत।
कफन में नहीं होती जेब
फिर धन भरने का क्यों ऐब
जुबां में होती ऐब
संयत वाणी से दूर भगाइए।
खाने को सेब, घूमने को कैब,
देखने को टैब भी अपनाइए।
जांच के लिए लैब सही,
मन बहलाने पब भी सही,
पर सबसे बड़ी पूंजी वही,
जो अच्छे कर्मों से भरती रही।
ज़िंदगी का आनंद लीजिए,
हर मौसम को गले लगाइए।
कर्मों की ऐसी जेब बनाइए,
जिसे समय भी खाली न कर पाए।
थोड़ी देर ही सही, बच्चे बन जाइए,
बारिश में भीगकर मुस्काइए।
धन, वैभव सब यहीं रह जाएगा,
नाम नहीं, कर्म साथ जाएगा।
बचपन की निर्मलता अपनाइए,
जीवन को सचमुच सफल बनाइए।
[ • सु-स्थापित लेखिका दीप्ति श्रीवास्तव प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की उपाध्यक्षा हैं. ]
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chhattisgarhaaspaas
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