आरंभ साहित्यिक मंच : उभरते हुए प्रगतिशील परंपरा एवं सोच के कवि डॉ. गिरधर चंद्रा ‘साज़’

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• डॉ. गिरधर चंद्रा ‘साज़’
• पिता- भूषणलाल चंद्रा एवं माता- स्व. मेमबाई चंद्रा के यहां 15 मई, 1975 को ग्राम- सकर्रा, जिला- सक्ति छत्तीसगढ़ में जन्में मूलनाम गिरधर प्रसाद चंद्रा भिलाई इस्पात संयंत्र में असोसिएट इंजीनियरिंग के पद पर पदस्थ हैं. • इनका विवाह ललिता से हुआ, पुत्री आस्था, पुत्र गीतांश है. • आप आईटीआई- इलेक्ट्रिशियन डिप्लोमा- इलेक्ट्रिकल, कम्पूटर, एमए [हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान एवं लोक प्रशासन] पीएचडी- हिंदी साहित्य [पं. रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर] शिक्षा प्राप्त की है. • साहित्यिक योगदान- ‘अंतर्मन के शब्द’ और ‘भावों की अभिव्यक्ति’ [काव्य संग्रह]/’समकालीन कविता में आदिवासी चेतना’ [शोध प्रबंध] पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन, मंच में सहभागिता. • सामाजिक एवं साहित्यिक निर्वहन- ‘चंद्रनाहूँ चंद्रा समाज’ छत्तीसगढ़ [अतिरिक्त महासचिव]/ ‘छत्तीसगढ़ी कूर्मि कल्याण समिति’ भिलाई [महासचिव]/’समता साहित्य समिति’ जिला- दुर्ग [महासचिव] • हाल ही में ‘साज़’ की दो काव्य संग्रह ‘अंतर्मन के शब्द’ एवं ‘भावों की अभिव्यक्ति’ के विमोचन कार्यक्रम में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. कृति तो मुझे अभी प्राप्त नहीं हुई है. विमोचन कार्यक्रम में ‘साज़’ ने अपनी तीन-चार कविता का पाठ किया था. कविता मैंने सुनी और यह कह सकता हूँ- • “कवि की कविताओं में चिंताएं और सरोकार साफ़ दिखता है. वे कविता को अंतर्मन से लिखते हैं तभी भावों की अभिव्यक्ति ओझल नहीं होती. इनकी लंबी कविता भी प्रगतिशील परंपरा से समकालीन कविता को जोड़ती हुई सार्थक रचनाशीलता की ओर ले जाती है. • छत्तीसगढ़ के इस संभावनाशील कवि डॉ. गिरधर चंद्रा ‘साज़’ का ‘आरंभ’ के इस साहित्यिक मंच में स्वागत करते हुए पहली बार इनकी कविता प्रस्तुत है, पढ़ें और कवि को हौसलाअफजाई के लिए दो शब्द भी लिखें… – संपादक
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• मुश्किल वक़्त है आज
– डॉ. गिरधर चंद्रा ‘साज़’

देश की लोगों का दिशा सोंच अब धरातल पे दिख रहा है ,
जुबाँ की क़ीमत नहीं ये तो थोड़े से लालच मे बिक रहा है ।
लोग थोड़े लालच से पाला बदल अपना जमीर बेंच रहें है ,
कोई और नहीं वो ही अपने चरित्र को खुद ही नोच रहें हैँ ।
जिसका प्रशंसा करता था देखो उसका विरोध कर रहा है ,
जो पहचान दिलाया उसे एहसान फ़रामोश यूँ कह रहा है ।
वक्त सबका आता है वो जो कर रहा कोई और भी करेगा ,
आज ये किसी को केंद्र मे रखा कल ये भी केंद्र मे रहेगा ।
दुनिया को एतराज नहीं सच का साथ दो ये दिख जाता है ,
लोग भुल जातें है पर मन संदेह की लकीर खींच जाता है ।
एकदिन सच तो सामने आयेगा वो हम सबको भी पता है ,
किसी का किये एहसान मत भूलो यहीं तो सच्ची वफ़ा है ।
दोस्त यूँ दुश्मन बना वो जहरीले साँप से भी खतरनाक है ,
क्यों ऐसा हुआ न पता तो भी समझ लो इरादा नापाक है ।
तुम्हारे साथ रहकर वो तुम्हारा राजदार यूँ लंका जलायेगा ,
जो अपनों को धोखा दिया वो तुमसे कैसे वफ़ा निभाएगा ।
बहुत मुश्किल मे है देश कुछ लोग साख गिराने मे लगे है ,
आश्चर्य की बात खुद को संविधान से ऊपर बताने लगे है ।
पता नहीं डर है या लालच लोग अपना पाला बदल रहें है ,
मुश्किल वक़्त है आज लोग संविधान से छल कर रहें है ।
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• दर्द में जिंदगी या जिंदगी में दर्द
-डॉ. गिरधर चंद्रा ‘साज़’

जहाँ पर कभी भी बात जिंदगी से जुडी हुई अब आती है ,
वहाँ पर जिंदगी के अनेको अनेक उलझन नजर आती है ।
तमाम समझदारी के बाद भी दूर तलक कोई सुकून नही ,
नीरस सी क्यों हो गयी जिंदगी चाहत का अब जूनून नहीं ।
सब करके यूँ देख लिया तो पर लग रहा मायूस है जिंदगी ,
कहीं पर यूँ मुबारक तो कहीं पर आज मनहूस है जिंदगी ।
खुशियों के साथ दर्द का आगाज भी जिंदगी का हिस्सा है ,
मुस्कुराहट के साथ आँसू का भी इंसा से करीब रिश्ता है ।
लाख कोशिशों के बाद अब दर्द रोक पाना नामुमकिन है ,
इंसा को भी शुभचिंतक बने रहना कहाँ तक मुमकिन है ।
ज़ब दर्द का सागर सर से पार हो गया तो एहसास हो रहा ,
खामोश हो रहा जुबाँ कारण नहीं पता पर यूँ दिल रो रहा ।
एक अच्छी सोंच भी पता नहीं क्यों आज खटकने लगा है ,
अपने वश था जो मन पता नहीं क्यों वह भटकने लगा है ।
सच है या वहम जो लग रहा मुझसे अपनों को दर्द हो रहा ,
ऊँचाई की चाहत भरा मन फिर से आज संतुलन खो रहा ।
बहुत कुछ पा लिया पर बहुत कुछ पाना अब भी बाकी है ,
जहाँ तक ले आया है मंजिल लग रहा वो भी नाकाफी है ।
इंसा हुँ बस एक सोंच के साथ वक़्त भी निकलते जा रहा ,
दर्द मे जिंदगी या जिंदगी मे दर्द ये भी समझ ना आ रहा ।
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• वो भूलने में कामयाब हो गया
-डॉ. गिरधर चंद्रा ‘साज़’

तमाम बंदिशों के वावजूद वो भूलने मे कामयाब हो गया ,
मैं अब भी भुल न सका उसे वो तो ईद का चाँद हो गया ।
उसे खुश रखने का प्रयास मैंने तो हमेशा यूँ दिल से किया ,
उसे तखलीफ ना हो इसलिए अपना जमीर भी बेंच दिया ।
सुना ना किसी का बात मैं उसे महफूज रखना चाहता था ,
उसके दिल पे क्या ना पता पर दिल मे रखना चाहता था ।
पता था दुनिया का दस्तूर पर लगता था अब ये नहीं होगा ,
पता नहीं मेरा अटूट विश्वास था मैं जो चाहूँगा वही होगा ।
समय तो पँख लगा निकलने लगा पर मेरा ख्वाब वहीँ था ,
मैं गलत हो गया पर जमाना का आकलन बहुत सही था ।
उसे देख कर मुझे लगा उसके दिल मेरे लिए जगह न था ,
मैं वफ़ा के लिए कर रहा था पर उसके दिल वफ़ा ना था ।
वो भुलने का दिखावा कर रहा पर कभी भुल ना पायेगा ,
ज़ब देगी जिंदगी उसे धोखा तो फिर याद मेरा सतायेगा ।
मैं उसको बद्दुआ नही दें सकता क्योंकि दिल से जुड़ा था ,
उसे दिल के करीब पाया था तभी यूँ दिल उधर मुड़ा था ।
पूरा यकीन था मेरे जैसा सोंच यूँ उसका भी जरूर होगा ,
कभी भी ख्याल नहीं आया की वह इतना मगरूर होगा ।
समय आया तो देखा यूँ बेवफाई का एहसास भी हो गया ,
तमाम बंदिशों के वावजूद वो भूलने मे कामयाब हो गया ।
[ डॉ. गिरधर चंद्रा ‘साज़’ प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के आजीवन सदस्य हैं.]
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chhattisgarhaaspaas
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