‘आरंभ’ साहित्यिक मंच : सुरभि ताम्रकार ‘शावि’
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• लोकतंत्र

लोकतंत्र अब
जुमलों का सबसे सफल उद्योग लगता है,
जहाँ सच
हर चुनाव के बाद बेरोज़गार हो जाता है।
बहुमत
विवेक का प्रमाण नहीं रहा,
कई बार
वह केवल शोर की संख्या होता है।
भूख हड़ताल अब
व्यवस्था की आँखों में
एक असुविधाजनक दृश्य भर है;
भूख से नहीं,
उपेक्षा से लोग मरते हैं।
यह कैसी व्यवस्था है, गांधी जी,
तुम्हारे भारत की?
यहाँ आमजन की मृत्यु
एक आँकड़ा बनते ही
शोक से मुक्त घोषित कर दी जाती है।
विकास की रफ़्तार का हाल देखो—
दीमक की बाँबी
मनुष्य के भविष्य से अधिक सुरक्षित दिखाई देती है।
देशप्रेम भी अब
पहचान-पत्र माँगता है,
और असहमति
राष्ट्रविरोध की वर्दी पहनाकर
कटघरे में खड़ी कर दी जाती है।
तुमने जिस सत्य को
सबसे बड़ा हथियार कहा था,
यहाँ वही
सबसे बड़ा अपराध बनता जा रहा है।
लगता है, गांधी जी—
तुम्हारी तस्वीरें तो बची रहीं,
पर तुम्हारे विचार
सरकारी दीवारों पर टँगे-टँगे
धीरे-धीरे दम तोड़ चुके हैं।
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• पापा

मैं कैसे दूर हो पाऊँगी, पापा,
अपने इस छोटे-से संसार से?
मैं तो घर से दूर हो जाने के
ख़याल भर से घबरा जाती हूँ।
मैं कैसे भूल पाऊँगी, पापा,
इन दीवारों को,
जिन पर पेंसिल और चॉक चलाकर
मैंने अपना पहला ब्लैकबोर्ड बना लिया था।
मैं कैसे भूल पाऊँगी, पापा,
वे कोने,
जहाँ छुपते-छुपाते
कभी नींद मुझे चुरा ले जाती थी।
मैं कैसे भूल पाऊँगी, पापा,
वह झूला,
जिस पर झूलते-झूलते
मैंने किताबों से दोस्ती की थी।
मैं कैसे भूल पाऊँगी, पापा,
वह रसोई,
जहाँ माँ से बातें करते-करते
रोटियों के साथ जीवन भी गूँथना सीख लिया।
मैं कैसे भूल पाऊँगी, पापा,
वह आँगन,
जहाँ मैं और मेरी बहनों ने
रंगोली में अपने बचपन के रंग भरे।
मैं कैसे भूल पाऊँगी, पापा,
वह छत,
जहाँ दौड़ते-दौड़ते
गिरकर हाथ तोड़ बैठी थी,
पर हौसला नहीं।
मैं कैसे भूल पाऊँगी, पापा,
दरवाज़े के पीछे की वह जगह,
जहाँ छिपकर
मैं तुम्हें डराया करती थी।
मैं कैसे भूल पाऊँगी, पापा,
वे गमले,
जिनमें मैंने
अपनी कल्पना के खेत उगा दिए थे।
मैं कैसे भूल पाऊँगी, पापा,
वे औज़ार, वे मशीनें,
जिनके बीच खेलते-खेलते
मैं बड़ी हुई।
मैं कैसे भूल पाऊँगी, पापा,
घर का हर कमरा,
जहाँ मेरी साँसों का एक-एक दिन
अब भी ठहरा हुआ है।
मैं कैसे भूल पाऊँगी, पापा,
वे सीढ़ियाँ,
जिनसे छलाँग लगाकर
मैं गाँव और शहर के बीच
अपनी ही दुनिया बसाया करती थी।
मैं कैसे भूल पाऊँगी, पापा,
अपने घर की वह चौखट,
जहाँ मेरे लौटने की आहट
पशु भी पहचान लेते थे।
मैं कैसे भूल पाऊँगी, पापा,
अपने पशुओं को,
तुम्हें,
और माँ को?
क्यों, पापा,
बेटी अपने ही आँगन की
केवल अस्थायी अतिथि मानी जाती है?
क्यों उसका बचपन,
उसकी स्मृतियाँ,
उसका श्रम,
उसका प्रेम—
सब उसी घर में रह जाते हैं,
और वह अकेली
एक नए घर की चौखट पर रख दी जाती है?
यदि बेटी
दो कुलों की दीपशिखा है,
तो फिर
तुलसी का चौरा
केवल ससुराल का ही क्यों होता है?
पापा
क्या उसके मायके के आँगन में
उसके नाम की
कोई हरियाली नहीं उग सकती?
[ • उभरती हुई कवियित्री सुरभि ताम्रकार ‘शावि’ की कविताएं घर-परिवार से जुड़ी संवेदनशील होती हैं. बहुत कम उम्र में ‘शावि’ की रचनाओं में जनपक्षीय सुंदर स्वप्न दिखता है. • इस अंक में दो कविताएं ‘लोकतंत्र’ और ‘पापा’ प्रस्तुत है, पढ़ें.. – संपादक ]
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