आरंभ साहित्यिक मंच : शुचि ‘भवि’

❤️
• ग़ज़ल- 1

आप अपने रंग का चोला हमें पहना गये
आप ही बस आप मन के बादलों पे छा गये
दिल में पसरा था अँधेरा ज़िंदगी की रात थी
आप उल्फ़त की अचानक रौशनी फैला गये
बात भी करने की उनको अब नहीं फुरसत कोई
उनकी फ़ुरसत,ले के रिश्वत,क्या ये लम्हे खा गये
टूटने से फूल के टूटी बहुत थी डाल भी
ये ग़नीमत थी कि भँवरे उसका जी बहला गये
सौंधी मिट्टी की वही ख़ुश्बू है महकी आज फिर
मुद्दतों के बाद फिर “भवि” आज आँसू आ गये
❤️
• ग़ज़ल- 2

झूठे हमें जज़्बात दिखाने नहीं आते
आदाब ज़माने के निभाने नहीं आते
हम आज भी बच्चे हैं ज़माने की नज़र में
सच है कि हमें रिश्ते निभाने नहीं आते
ज़िंदा है यहाँ जिसकी बदौलत मेरी उल्फ़त
उससे भी तो मिलने के बहाने नहीं आते
ख़्वाबों में मुलाक़ात हुआ करती है अकसर
वो सुब्ह किसी रोज़ जगाने नहीं आते
सस्ता न करो प्यार को दुनिया की नज़र में
हर बार इसे ईश बचाने नहीं आते
काँटों की चुभन से भी अधिक चुभते हैं अल्फ़ाज़
क्यों बोल उन्हें मीठे सुनाने नहीं आते
अब तीज व त्यौहार बचे नाम बराबर
‘भवि’ लोग कभी मिलने मिलाने नहीं आते
❤️
• ग़ज़ल- 3

जो पड़ गयी थी मुझको वो आदत चली गयी
जाते ही उसके मेरी क़यादत चली गयी
माना मेरी शिकस्त हुई है फिर एक बार
पर तुम न ये समझना कि हिम्मत चली गई
मुँह से ज़ियादा नाज़ तो आँखों पे था मगर
उनकी भी जाने कैसे हुकूमत चली गई
क्योंकर मिला वो हमसे खुले आसमान सा
छुप छुप के उससे मिलने की लज़्ज़त चली गयी
‘भवि’ सोचती है आज रखा क्या है इश्क़ में
इसमें तो दिल की सारी ही दौलत चली गई
[ • छत्तीसगढ़ भिलाई की शुचि ‘भवि’ सु-स्थापित कवयित्री है. ]
❤️❤️❤️
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)