इस माह के ग़ज़लकार : सुशील यादव

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• सुशील यादव
• प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के आजीवन सदस्य सुशील यादव की अब तक दो गद्य व्यंग्य संग्रह- ‘शिष्टाचार के बहाने’, ‘गड़े मुर्दों की तलाश’ दो ग़ज़ल संग्रह- ‘नर्म लहज़े में’ और ‘दिल की कलम से’ प्रकाशित हुई. • सु-स्थापित ग़ज़लकार सुशील यादव के लिखे 700 दोहे एवं 40-50 ग़ज़लें, जिसे ‘सुनो ए’ [Suno Ai] ने स्वर दिया है. यू-ट्यूब चैनल पर ‘सुशील यादव की ग़ज़ल’ कहकर या लिखकर सुना जा सकता है. • डिप्टी कमिश्नर कस्टम्स सेंट्रल एक्साइज एवं सर्विस टैक्स विभाग से सेवानिवृत्त होने के बाद सुशील यादव निरंतर लेखन कार्य में सक्रिय हैं. • सुशील यादव ने अब तक 700 दोहा, 500 ग़ज़ल एवं 150 गद्य-व्यंग्य का सृजन कर चुके हैं. इनकी ग़ज़लों को यू-ट्यूब चैनल पर पद्मधर झा की गायिकी में भी सुना जा सकता है. • अनेकों साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित सुशील यादव तीन बार अमेरिका की यात्रा भी कर चुके हैं. • देश की तमाम महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ- स्थानीय समाचार पत्रों के रविवारीय संस्करण, साप्ताहिक हिंदुस्थान, कादम्बिनी, सरिता, मुक्ता में गद्य व्यंग्य का प्रकाशन और वेब मेंगजिंन ‘साहित्य कुंज’ [कनाडा] से गद्य कोष प्रकाशित. फेसबुक पर भी निरंतर लेखन सक्रिय. • सुशील यादव कहते है कि- ‘मेरी ग़ज़ल बहर मीटर और वजन नापित रहती है’
Susyadav7@gmail.com
-संपादक
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ग़ज़ल-1

घर फूंकने की हमको इजाजत न मिल सकी
रुसवाइयां भी राह गनीमत न मिल सकी
बर्बादियों का जश्न मनाने चले थे हम
हमको बहार आई तो फुरसत न मिल सकी
हैं ताकती ये लोग तो अफसोस क्या करें
राहत की मंडियों कोई राहत न मिल सकी
लाशें बिछा के कौन ये सड़कों में घूमता
कातिल हैं सामने औ हकीकत न मिल सकी
ये ख्वाहिशें बसंत की अब क्या बताएं हम
बीमार को वो पहली तबीयत न मिल सकी
कब फूल कुछ उमंग के आँगन में खिल सके
जो देवता चढ़ा सकूं , आदत न मिल सकी
क्या- क्या नहीं मिला है जमाने से आज तक
इक आख़िरी सी मांग थी चाहत न मिल सकी
तुझसे थी दोस्ती की तलब हमको ज़िन्दगी
थी मौत सामने तो हिदायत न मिल सकी
पूजा है बारहा कहीं पत्थर रखा मिला
पर वो नसीब की लिखी दौलत न मिल सकी
लो आज हमने पाई जमाने की हर ख़ुशी
पर राजसी अकड़ की सहूलत न मिल सकी
तुझपे किया था हमने भरोसा बहुत सुशील
तुझसे ही दोस्ती भी सलामत न मिल सकी
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ग़ज़ल- 2

मैं तुझसे मिलने का, कोई बहाना ढूढ लेता हूँ
घने ज़ंगल गड़ा- भूला, ख़जाना ढूंढ लेता हूँ
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सितम – ज़ुल्मों बनी, तेरी गली, लेकिन ज़ुदा हो के
नसीबो में लिखा ,अपना ,घराना ढूंढ लेता हूँ
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न भाये है,हमें तारीफ़ के, पुल से ग़ुजरना भी
शराफ़त से झुकाने सर, निशाना ढूंढ लेता हूँ
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अगर नज़दीक आने में हिचक थी कोई कभी तुमको
वज़ह पूछे बिना भीतर, फ़साना ढूंढ लेता हूँ
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अग़र करवट, बदलता वक्त भी मेरे नसीबों सा
मै पेचो ख़म में, उलझा- खत पुराना ढूंढ लेता हूँ
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मुझें बेकार समझे हो , भले लोगो अभी मानो
क़दर पाने, कहीं महफ़िल, ठिकाना ढूंढ लेता हूँ
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छिपाओ लाख, बादल- बिजलियां ,ख़ुशबू हवा भी तुम
हक़ीक़त कहते ज़ुमलों में, ज़माना ढूंढ लेता हूँ
[ • सुशील यादव, न्यू आदर्श नगर, जोन-1, स्ट्रीट-3, दुर्ग, छत्तीसगढ़ ]
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chhattisgarhaaspaas
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