कवि और कविता : इस माह के कवि में नीलमचंद सांखला
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• नीलमचंद सांखला
[ • कवि हृदय नीलमचंद सांखला जी 1990 में बालाघाट से न्यायिक सेवा की शुरूआत करते हुए दंतेवाड़ा, दुर्ग, रायपुर में प्रधान जिला सत्र न्यायाधीश के पद पर पदस्थ रहे. • आप छत्तीसगढ़ उच्चन्यायालय में रजिस्ट्रार जनरल से सेवानिवृत्त हुए. • छत्तीसगढ़ राज्य मानव अधिकार आयोग में सदस्य भी रहे. • 2012 में नीलमचंद सांखला जी को प्रशासनिक क्षमता के लिए अखिल भारतीय जैन समाज द्वारा सम्मानित किया गया. • बीकॉम.एलएलबी तक शिक्षा प्राप्त, 06 अक्टूबर,1961 को जन्में नीलमचंद सांखला जी अनेकों प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर छपते रहते हैं. कवि सम्मेलनों के मंचों के अलावा रेडियो एवं दूरदर्शन में भी भागीदारी रहती है. • इनकी प्रकाशित काव्य कृतियाँ हैं- ‘बाई का नज़रिया’/’माई जी का इकतीसा’ और ‘माज़ीसा का चालीसा’. • इनकी कविताएं जन-पक्षधर होती हैं. अल्पतम में महत्तम समेटती हैं इनकी कविता. प्रगतिशील परंपरा से समकालीन कविता को जोड़ती हुई सार्थक रचनाशीलता आपकी कविता में दिखती है. • नीलमचंद सांखला जी से जब मेरा परिचय हुआ और उनको जाना तो उनके शब्द का सार मुझे यह लगा कि- ‘साहित्य जल्दबाज़ी की जगह नहीं, धीरज का मुकाम है. हम हैं तो भाषा में हैं, हम होंगे तो भाषा में होंगे’ • आप ‘अंतर्राष्ट्रीय जैन कवि संगम’ और प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के संरक्षक हैं. – संपादक ]
• ऐ जिंदगी अब मुझे जीने दे

सच क्यूँ बेबस पड़ा है?
यह सोचकर दिल रो पड़ा है ।
वे झूठ ऐसे बोलते हैं,
सच की रूह कांप उठती है।
सच के मुंह में ताले क्यूँ पड़े हैं?
यह सोचकर मन तड़प उठाता है।
झूठ का बिगुल,
सच को सुनाई क्यूँ नहीं देता ,
क्या सच बहरा हो गया है?
यह सोंच कर कान खड़े हो गये हैं।
झूठों का बाजार सजा है
लोग घर में झूठों की तस्वीर लगा रहे हैं
घर के किसी कोने में, सच दुबके पड़ा है
यह सोचकर घर काटने
लगा है ।
सच को संवारने वाले क्या? बुजदिल हो गए हैं
यह सोचकर ….
मन दुखी हो गया है ।
क्या सच को अब सहारे की जरूरत पड़ी है
यह सोचकर , मस्तिष्क शून्य हो चला है ।
झूठ की जब कैंची चलती है सच ,क्यूँ मुंह खोलता नहीं है
इसका उत्तर क्यों मैं नहीं जान पता
यह सोचकर मन व्यथित हो
चला है
प्रकृति क्यूँ बेबस पड़ी है
वह सच की क्यूँ नहीं हो चली है ?
यह सोचकर …
सच पर दया आ रही है ।
झूठों की फिजा में प्रकृति कैसे बचेगी
बिन प्रकृति हमारे अस्तित्व क्या होगा ?
यह सोचकर …
रूह कांप उठी है।
क्या सच अब कब्र में रहेगा उस कब्र में झूठ का महल बनेगा
यह बात क्या आत्मा मान लेगी
यह सोचकर दिल रो पड़ा है।
झूठ के सामने सच मौन पड़ा है
सच, क्या गूंगा हो चला है ?
यह सोचकर ….
नयन नीर से भर गया है।
नीर, नयन से झरने लगी है
बंद आंखें शून्य में निहारने लगी है
तभी हवा का झोंका खुशबू बन
मन मस्तिष्क में छाने लगी है ।
हवा कानों में गुनगुनाने लगी है सच मौन होता है
सच का जवाब …
शब्द नहीं, वक्त देता है।
… ]
ऐ जिंदगी अब मुझे जीने दे
ख्वाब के मकड़जाल में
अब ना मुझे भड़कने दे
ऐ जिंदगी अब मुझे जीने दे।
जब भी भटकेगा मन मेरा
तू उसे ख्वाब के पर ना लगा
जो दिया है तूने इस जहां में
क्या वो कम है मेरे लिए
सुकूँ के घरौंदे को
अब आशिया मेरा बनने दे
ऐ जिंदगी ….
अब मुझे जीने दे
ना शिकवा है तुझेसे
ना चाहत भी है तुझेसे
जो दिया है तूने
नसीब से बढ़कर है ।
जो पाया है उसे ही तू सहेजा है
अब उसे संवारने का कुछ वक्त दे
ऐ जिंदगी ..
अब मुझे जीने दे।
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• तुम मुझे कैसे भुला पा ओगी

तुम लाख भुलाना चाहो मुझे
तुम मुझे भूल नहीं पाओगी।
बांधों को देखकर भूल ना करना
कि नदियाँ बहन भूल गई शहरों में घरौंदे बनते ना देख यह मत समझना चिड़ियों ने चहकना छोड़ दिया
मुझे डराना नहीं आता तो क्या हुआ
लोग अभी प्यार से डरा करते हैं
ख्वाबों को सुबह भूल सकती हो तुम
मैं तो तुम्हारे पलकों में बसा करता हूं
निगाहों में तस्वीर किसी और की है
मगर झपकाती पलकों में सूरत मेरी ही है
मैं तुम्हारे दिल में नहीं
धड़कनों में बस करता हूं
धड़कता दिल मस्तिष्क से नहीं
धड़कनों से बात करता है
तुम चाह कर भी धड़कनों को रोक नहीं पाओगी
अब कहो तुम मुझे कैसे भुला पाओगे
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• सच क्यूँ बेबस पड़ा है?

सच क्यूँ बेबस पड़ा है?
यह सोचकर दिल रो पड़ा है ।
वे झूठ ऐसे बोलते हैं,
सच की रूह कांप उठती है।
सच के मुंह में ताले क्यूँ पड़े हैं?
यह सोचकर मन तड़प उठाता है।
झूठ का बिगुल,
सच को सुनाई क्यूँ नहीं देता ,
क्या सच बहरा हो गया है?
यह सोंच कर कान खड़े हो गये हैं।
झूठों का बाजार सजा है
लोग घर में झूठों की तस्वीर लगा रहे हैं
घर के किसी कोने में, सच दुबके पड़ा है
यह सोचकर घर काटने
लगा है ।
सच को संवारने वाले क्या? बुजदिल हो गए हैं
यह सोचकर ….
मन दुखी हो गया है ।
क्या सच को अब सहारे की जरूरत पड़ी है
यह सोचकर , मस्तिष्क शून्य हो चला है ।
झूठ की जब कैंची चलती है सच ,क्यूँ मुंह खोलता नहीं है
इसका उत्तर क्यों मैं नहीं जान पता
यह सोचकर मन व्यथित हो
चला है
प्रकृति क्यूँ बेबस पड़ी है
वह सच की क्यूँ नहीं हो चली है ?
यह सोचकर …
सच पर दया आ रही है ।
झूठों की फिजा में प्रकृति कैसे बचेगी
बिन प्रकृति हमारे अस्तित्व क्या होगा ?
यह सोचकर …
रूह कांप उठी है।
क्या सच अब कब्र में रहेगा उस कब्र में झूठ का महल बनेगा
यह बात क्या आत्मा मान लेगी
यह सोचकर दिल रो पड़ा है।
झूठ के सामने सच मौन पड़ा है
सच, क्या गूंगा हो चला है ?
यह सोचकर ….
नयन नीर से भर गया है।
नीर, नयन से झरने लगी है
बंद आंखें शून्य में निहारने लगी है
तभी हवा का झोंका खुशबू बन
मन मस्तिष्क में छाने लगी है ।
हवा कानों में गुनगुनाने लगी है सच मौन होता है
सच का जवाब …
शब्द नहीं, वक्त देता है।
[ • ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ पत्रिका के ‘कवि और कविता’ स्तम्भ में नीलमचंद सांखला की कविता पहली बार शामिल की जा रही है, पाठक पढें और प्रतिक्रिया से अवगत कराएं- संपादक ]
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chhattisgarhaaspaas
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