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ट्रायल कोर्ट की प्रक्रियागत चूक पर CG हाई कोर्ट सख्त, कहा- आरोप तय करने से पहले डिस्चार्ज अर्जी का निपटारा कानूनी रूप से अनिवार्य

बिलासपुर। हाई कोर्ट ने आपराधिक मामलों में ट्रायल कोर्ट द्वारा की जाने वाली प्रक्रियागत चूक पर कड़ी नाराजगी जताई है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि आरोप तय करने से पहले आरोपित द्वारा दायर की गई डिस्चार्ज अर्जी पर निर्णय लेना अनिवार्य है। जांजगीर-चांपा के विशेष न्यायालय द्वारा बिना डिस्चार्ज अर्जी का निपटारा किए आरोप तय करने पर कोर्ट ने नाराजगी जताई, लेकिन मामले के तथ्यों के आधार पर आरोपितों की एफआईआर और चार्जशीट रद्द करने की याचिका खारिज कर दी।
अजाक थाने में मामला दर्ज किया गया
मामला अकलतरा क्षेत्र का है, जहां कक्षा 12वीं की एक छात्रा ने अपने स्कूल के खेल शिक्षक के खिलाफ यौन उत्पीड़न और आपराधिक धमकी का मामला दर्ज कराया था। पांच जनवरी 2026 को जब छात्रा और उसके माता-पिता कोर्ट से लौट रहे थे, तब शिक्षक के भाई और पिता ने उन्हें रोककर जातिसूचक गालियां दीं और जान से मारने की धमकी दी। इसके बाद अकलतरा के अजाक थाने में मामला दर्ज किया गया।
ट्रायल कोर्ट की ‘भूल’ पर हाई कोर्ट सख्त
याचिकाकर्ताओं के वकील पी. चेतन कुमार ने हाई कोर्ट में दलील दी कि स्पेशल कोर्ट ने छह मई 2026 को आरोप तय किए, जबकि 15 अप्रैल 2026 को दायर डिस्चार्ज अर्जी पर कोई फैसला नहीं किया गया। हाई कोर्ट ने इस प्रक्रियागत चूक को गंभीर माना और कहा कि इससे आरोपित के अधिकार प्रभावित हुए। हालांकि, अदालत ने पाया कि आरोपितों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। इसलिए एफआईआर और चार्जशीट रद्द करने की मांग खारिज करते हुए पिता-पुत्र को ट्रायल कोर्ट में मुकदमे का सामना करने का निर्देश दिया।
पर्याप्त साक्ष्य होने से याचिका खारिज
हाई कोर्ट ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में आरोप तय करने से पहले डिस्चार्ज अर्जी पर फैसला करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। हालांकि, इस मामले में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपितों के खिलाफ मुकदमा चलाने के पर्याप्त आधार हैं। इसलिए केवल प्रक्रियागत चूक के आधार पर एफआईआर और चार्जशीट रद्द नहीं की जा सकती।
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