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समीक्षा : अनेक त्रुटियों से परिपूर्ण है ‘ रचना साहित्य समिति गुरुर ‘ द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘ आकांक्षा ‘ : समीक्षक प्रो. के. मुरारी दास

किसी भी पत्र-पत्रिका या कृति की समीक्षा करना इतना आसान काम नहीं है. यदि पत्र पत्रिकाएं या कृति किसी करीबी जनों के मध्य हो तो वह और भी चुनौती पूर्ण हो जाता है. क्योंकि ऐसी स्थिति में किसी भी प्रकार की समीक्षा या आलोचना करने के पूर्व रिश्तों या संबंधों का सामने आड़े आ जाना स्वाभाविक ही हैं .और यदि आवश्यकता से ज्यादा प्रशंसा कर दी जाए तो समीक्षक पर भी चाटुकारिता करने जैसा आरोप लगते देरी नहीं लगती.
अंचल की चार दशक पूरानी रचना साहित्य समिति पत्रिका प्रकाशन के क्षेत्र में 6 पायदान पार कर लगभग एक डेड़ दशक बाद 7वें पायदान पर कदम रखा है. पत्रिका भले ही अनियतकालीन हो पर उनके अंदर की सामग्री क्षेत्रीयता से आगे नही बढ़ सका जिन्हें अब तक राज्य स्तरीय पत्र पत्रिकाओं की श्रेणी में स्थान बनाने में संघर्षरत होना चाहिए था,लेकिन इसका वर्तमान अंक ही अनेक खामियों और त्रुटियों से परिपूर्ण है कि प्रदेश क्या क्षेत्रियता से भी आगे बढ़ाने की स्थिति नहीं दिखती.यह अंक अपने पुराने अंको से तुलना में भी पीछे दिखाई पड़ता है .
इसके पिछ्ले अंकों का जिक्र नहीं करूंगा,क्योंकि पूर्व अंकों का संपादन सुलझे हुए व अनुभवी लेखकों द्वारा किया गया था. पर सातवें अंक की प्रति पर बात करना इसलिए समीचीन हो जाता है कि, इस अंक के संपादन में उम्र में वरिष्ठतम होने के बावजूद भी संपादन में कोई भी कलात्मक प्रतिभा देखने को नहीं मिला.दूसरे शब्दों में संपादन कला से ये न सिर्फ अंजान है,बल्कि इससे कोसों दूर रहे हैं. ऐसी भी बात नहीं की इस अंक के संपादक और संपादन सहयोगियों के पास पर्याप्त शिक्षा नहीं है , बल्कि सच बात तो ये है कि, समिति के अध्यक्ष, मुख्य संपादक और संपादन मंडलों की शैक्षणिक योग्यताएं भी स्नातकोत्तर से कम शायद ही किसी का हो. इनमें से अधिकांश प्राचार्य और शिक्षा अधिकारी जैसे पद को भी सुशोभित कर सेवानिवृत हो चुके हैं. इस बात की पुष्टि स्वयं इनके द्वारा लिखे गए अधिकांश लेखों और रचनाओं के अंत में बार-बार और प्रमुखता से जिक्र होता है. यही नहीं अपनी रचनाओं को समिति के रचनाकार कभी अंग्रेजी के संक्षिप्त नाम से लिखते हैं तो कहीं-कहीं इसकी रचनाएं पाठक को पूरे नाम के साथ दिखाई पड़ती है. जैसे-पंचराम हिरवानी और पी
आर हिरवानी, डीआर गजेंद्र और दयालु राम गजेंद्र, एसएल कलिहारी और संपत लाल कलिहारी आदि.
लगभग 70 पृष्ठ की इस अनियतकालीन पत्रिका में एकाएक एक सामान्य पाठक को त्रुटियां भले नजर ना आए पर जब आप आहिस्ता आहिस्ता पढ़ते हुए आगे बढ़ते हैं तब न सिर्फ प्रुफ सम्मत त्रुटियों से आप अवगत होते हैं, बल्कि सबसे अधिक त्रुटियां पत्रिका के तकनीकी पक्ष में पाते हैं. जो समिति और पत्रिका के संपादक मंडल की शिक्षा,पद और उनकी योग्यता पर भी अनेक प्रश्न चिन्ह लगाते हैं . एक समय था जब कंप्यूटर और मोबाइल लोगों की पहुंच से दूर था. तब भी इतनी सारी गलतियां नहीं होती थी पर कंप्यूटर मोबाईल और लैपटॉप जैसी अनेक सुविधाएं आज प्रत्येक घरों में या आसानी से कंप्यूटर दुकानों में सहज ही उपलब्ध है ,ऐसी स्थितियों में भारी त्रुटियों का होना हमारी समझ शक्ति को भी आइना दिखाती है. पत्रिका में निहित अधिकांश सामग्री का स्तर भी समाज और संस्कृति के आसपास घूमता हुआ नजर आता है. पर इसका अर्थ यह भी नहीं की अपनी लेखन के माध्यम से रचनाकारों ने समाज की किसी अनकही या अनछुए समस्या पर वैज्ञानिक चिंतन प्रस्तुत किया हो.
पत्रिका की शुरुआत डी.आर. गजेंद्र की छत्तीसगढ़ी की काव्य रचना सरस्वती वंदना से प्रारंभ होती है. हिंदी पुट की अधिकता की वजह से यह बहुत अच्छी रचना नहीं बन सकी . इसके साथ ही निरंतर चार रचनाकारों की रचनाएं स्थान पाई. दिनेंद्र साहब की एक कहानी तोहफा के बाद पुनः चार रचनाएं एक साथ स्थान पाई, जिसमें पूरण लाल माली की शिक्षक युग निर्माता, डॉ उमेश लोहाना की ग़ज़ल व सत्य प्रकाश महमल्ला की छत्तीसगढ़ी व्यंग्य नशाबंदी स्तरीय लगे .वहीं सेवाराम तेजस्वी की बिन मौसम बरसात एक तुकबंदी से ज्यादा कुछ नहीं है.
छत्तीसगढ़ी में एक कहावत है अंधरा बांटे रेवड़ी अपने अपन ला दे. पत्रिका के इस अंक में मुझे यही बात ज्यादा सटीक लगी. एक से अधिक जिनकी रचनाएं इस अंक में प्रकाशित की गई है उनमें समिति के अध्यक्ष डीआर गजेंद्र मुख्य,संपादक जी के साहू,संपादन सहयोगियों में टी.आर.महमल्ला, एस.आर.तेजस्वी, नारायण साहू,भरत बुलंदी,पं.मोहन चतुर्वेदी और प्रमुख है. सबसे महत्वपूर्ण बात एच.डी महमल्ला की पांच रचनाएं संपादक मंडल द्वारा प्रकाशित की गई है. इतनी ज्यादतियां तो मालिकाना हक रखने वाले पत्र पत्रिका के संपादक और प्रकाशक भी नहीं रखते,लेकिन जिन रचनाकारों की चर्चा अक्सर प्रिंट मीडिया में सुर्खियां बटोरती रही है उनकी रचनाएं इस पत्रिका में आज हासिये पर है. कहानी के क्षेत्र में श्री भाव सिंह हिरवानी जिनका एक चिंतन होनी तथा इतिहास, परंपरा पुरातत्व और संस्कृति पर समान अधिकार रखने वाले डॉ.प्रकाश पतंगीवार का पुरावतात्विक आलेख गुरुर के पूरा अवशेषों का संरक्षण जरूरी ऐसे ही कुछ नामों में से एक हैं. आश्चर्य की बात तो तब है उक्त आलेख को संपादक मंडल का आलेख बताया गया है .जबकि संपादन मंडल में इस नाम का कहीं जिक्र नहीं . समिति के रचनाकारों को अपनी रचनाओं के अंत में बार-बार रचना साहित्य समिति का जिक्र नहीं करना चाहिए. यदि कोई बाहर का रचनाकार अपनी रचनाओं के साथ अपनी समिति का जिक्र करता है तो वह सही कहा जा सकता है,यह पत्रिका के तकनीकी पक्ष को प्रत्येक दृष्टि से कमजोर करता है. एक अच्छी पहल इस पत्रिका में देखने को मिली कि दिवंगत रचनाकारों की रचनाओं को स्थान देने का प्रयास किया गया है हमारे संपादक, और रचनाकारों को हमेशा यह बात याद रखना चाहिए कि साहित्यकार कभी स्वर्गीय नहीं होता इससे परहेज करना चाहिए.कुलदीप साहू,मिट्ठू लाल पटेल और मिश्रीलाल खत्री की रचनाओं को शामिल किया गया, किंतु इस समिति में और भी अनेक दिवंगत रचनाकार हुए जिन्हें इसी बहाने याद ही कर लेना चाहिए था. पर ऐसा उचित नहीं समझ गया.जैसे रामायण पटेल,साधु राम सिंन्हा, ईश्वर दास मानिकपुरी, आदि दिवंगत रचनाकार हैं , तो समिति के पुराने और सशक्त रचनाकारों में नाथूराम गंगबेर, पुष्पा नागले अंजलि, चंपेश्वर राजपूत, पूर्णोत्तम साहू, परमानंद साहू, लीलाराम सिंन्हा, प्रदीप मेहता जो किसी परिचय के मोहताज नहीं रहे, उन्हें या तो उपेक्षित किया गया है या विस्मृति किया गया है. कुछ और रचनाकार जिनकी रचनाएं यहां स्थान पा सकी है उनमें पंचराम हिरवानी, पुनूराम गुरुपंच, लक्ष्मण उमरे, दानेश्वर सिंन्हा, लिखन साहू, एस एल सोनबोईर, केशव साहू, बेनूराम सेन प्रमुख है.
पत्रिका में तीन दर्जन से अधिक कविताएं तथा आधा दर्जन के करीब गद्य रखना शामिल है पत्रिका में प्रकाशित कुछ रचनाकारों से व्यक्तिगत चर्चा के दौरान उन्होंने नाराजगी जताई है . तो कइयों ने इसे संपादकों की ज्यादतियां तक कहा.
आलोचना पक्ष में एक और बात जोड़ना चाहूंगा पत्रिका के विषय सूची (अनुक्रमणिका) में इस बात का जिक्र नहीं है कि किसकी रचना कौन सी पृष्ठ में है तथा कौन सी कविता है कौन सी कहानी है इन पर अध्यक्ष संपादक और संपादन मंडल का कहीं ध्यान नहीं गया क्या विषय सूची के अंदर निहित दो शुभकामना संदेश, संपादकीय और अध्यक्ष की कलम से का जिक्र नहीं होना चाहिए था पर अनुक्रमणिका में ऐसा संभव नहीं है कुल मिलाकर यह पत्रिका सामान्य पाठक तक ही सीमित रहे तो अच्छा होगा नहीं तो आलोचना के नाम पर इसकी छीछालेदर होने की संभावना अधिक है.
•आकांक्षा
{अनियतकालीन साहित्यिक पत्रिका}
•जीके साहू, संपादक
•प्रकाशक –
रचना साहित्य समिति, गुरुर, जिला – बालोद, छत्तीसगढ़
•पृष्ठ संख्या : 70
•संपर्क –
•99071 33707
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