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‘कुछ जमीन से कुछ हवा से ‘ : नेहरू का लोकनायकत्व – विनोद साव

3 years ago
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‘माय फेवरेट हीरो’ कौन? यह एक ऐसा सवाल था जो हर साल अंग्रेजी के प्रश्नपत्रों में वैसे ही आता था जैसे हिंदी की हर परीक्षा में ‘लहना सिंह का चरित्र चित्रण लिखो’ आता था. हिंदी निबंध में जो ‘किसी एक नायक’ पर निबंध लिखो कहा जाता था वह अंग्रेजी ऐसे में ‘माय फेवरेट हीरो’ होता था. तब गाँधी और नेहरू के सिवा कोई नायक नहीं था…विशेषकर पहले प्रधानमंत्री होने और अपने सत्रह वर्षीय चुनौतीपूर्ण कार्यकाल और चुम्बकीय व्यक्तित्व के कारण नेहरू ही सबसे बड़े ‘आइकॉन’ हो गए थे. आज गाँधी नेहरू के विरोध के समय में पता नहीं छात्रगण किन्हें अपना नायक बताते हुए निबंध लिख रहे हैं!

नेहरू के समय में जो दिलीप-राज-देव हीरो थे उनके भी हीरो नेहरू थे और वे तीनों भी समय निकालकर नेहरू जी के चुनाव प्रचार में निकल जाते थे. फिल्मों के स्टारडम से कई गुना अधिक था नेहरू का स्टारडम. नेहरू में ‘नायकत्व’ (heroism) इतना कूट कूट कर भरा था कि उनके नाजो नक्श को लेकर कई विवाद भी बनते बिगड़ते थे. आज जिस जैकेट को पहनकर रूमानी अदा में शशि थरूर जैसे कितने ही लोग अंग्रेजी झाड़ रहे हैं ऐसी अदा नेहरू अपने समय में कितनी ही दिखा गए थे. नेहरू के बारे में यह चर्चित था कि वे जब अंग्रेजी में भाषण देते थे तब अंग्रेज भी डिक्शनरी लेकर बैठ जाते थे. वही जवाहर जैकेट है जो अब मोदी जैकेट बनकर कहर ढा रहा है. मोदी और थरूर दोनों के ही ट्विटर पर सबसे ज्यादा फालोवर हैं.

‘भारतीय संस्कृति का इतिहास’ लिखने वाले जॉर्ज ग्रियर्सन ने प्रेमचंद की लोकप्रियता को रेखांकित करते हुए कहा था कि “जब देश में नेहरू की लोकप्रियता का तूफान सरसरा रहा था ऐसे समय में हिंदी का एक लेखक प्रेमचंद अपने पाठकों के दिल में काबिज हो रहा था.” तो नेहरू को प्रसिद्धि का एक मानक मान लिया गया था. यह लोकनायकत्व आजादी से पहले गाँधी में और आजादी के बाद नेहरू में देखा गया. गाँधी पर बोलने से पहले वक्ता गण यह भी बोल उठते थे कि “यह राम कृष्ण गाँधी का देश है.” गाँधी में राम की तरह मर्यादा का आग्रह बहुत था. नेहरू अपने सम्मोहक रूप में पुरा कथाओं के नायक कृष्ण की तरह भक्ति और आसक्ति के केंद्र हो गए थे. उन पर आशिक मिजाजी का आरोप लगता था पर इसे ‘रोमान’ से नहीं ‘प्रेम’ से जोड़कर देखा जाना चाहिए. उनके ह्रदय का प्यार अनेक आयामों में मुखरित होता था. वे महान देशभक्त माने गए थे. उन्हें अपने शहर इलाहाबाद और गंगा से प्यार था. वे घंटों पत्नी कमला नेहरू के साथ गंगा के किनारे बैठे रहते थे. बच्चों में तो वे इतने रम जाते थे कि उनके जन्मदिवस को ‘बालदिवस’ के रूप में याद किया जाता है.

इस प्रेम को गाँधी-नेहरू सम्बंधों में भी झाँका जा सकता है जहाँ गाँधी कहते हैं कि “हमें एक दूसरे से अलग करने के लिए केवल मदभेद ही काफी नहीं है. ऐसा लगता है, कि मेरी भाषा जवाहर को और उसकी भाषा मुझे समझ नहीं आती है. यह सही हो न हो, पर भाषा ह्रदय के मिलन में बाधा नहीं होती. मैं इसे जानता हूँ कि जब मैं नहीं रहूँगा, जवाहर मेरी भाषा बोलेंगे. वह ही मेरे एकमात्र उत्तराधिकारी हैं.”

इलाहबाद में पिता से मिली वकालत को थका देने वाला और उबाऊ काम मानकर उन्होंने स्वयं को सार्वजनिक कार्यों में व्यस्त कर लिया. यह देखकर गाँधी को चिंता हुई कि एक समृद्ध घराने का युवा साथी सब कुछ छोड़कर आ गया है. उन्होंने नेहरू से पूछा कि “तुम्हारी कहीं नौकरी लगवा दूं?” नेहरू ने मना कर दिया. तब गाँधी जी की इतनी साख थी कि बिडला जैसे बड़े कई उद्योगपति उनके अनुयायी थे. इसलिए गाँधी जी जरुरतमंदों की नौकरी भी लगवा सकते थे.

नेहरू के नायकत्व को बढ़ाने वाली कई चीजें थीं – इनमें उनका कश्मीरी पंडित वाला चमचमाता रंग रूप, सलोनी कद काठी, सुन्दर नुकीली नाक और शेरवानी के ऊपर जैकेट के तीसरे काज में टांका हुआ गुलाब. सिर में गाँधी टोपी लगा लेने के बाद उनका व्यक्तित्व और भी गरिमामय हो उठता था. गाँधी जी टोपी कब लगाए यह अक्सर देखने में नहीं आता था पर नेहरू ने उनकी टोपी हमेशा लगाई. बल्कि बिना टोपी के नेहरू भी गाँधी नजर आते थे. भारतीय रिज़र्व बैंक ने एक बार एक रुपये का ऐसा सिक्का जारी किया था जिसमें नेहरू का बिना टोपी वाला चित्र उकेरा गया था. गंजा सिर होने के कारण उसे बड़े दिनों तक लोग गाँधी जी का ही चित्र समझते रहे जब सिक्के के ऊपर लिखे नाम को पढ़ते तब जान पाते थे कि वे नेहरू हैं.

अंग्रेजी के साथ नेहरू जी की हिन्दुस्तानी जुबान थी जिसमें हिंदी व उर्दू-फारसी का इतना संतुलित सम्मिश्रण था कि वह तबके भारत में ज्यादा संप्रेषित होने वाली जुबान हो गई थी. इसी जुबान से सुभाषचंद्र बोस और कई दूसरे नेतागण भी बखूबी बोला करते थे, मंच से जनता को संबोधित किया करते थे. नेहरू की इसी जुबान का असर हमारी हिंदी फिल्मों में भी पड़ा. फिल्मों के संवाद और कथात्मक प्रभाव को बढ़ाने व फिल्मों का बाज़ार बनाने के लिए फिल्म निर्माताओं ने इसी हिंदी-उर्दू जुबान को हाथों हाथ लिया और हम देख रहे हैं कि किसी भाषायी शुद्धता से बचकर फिल्मों ने आज भी इसी मिश्रित जुबान को कायम रखा और अपनी सफलता के झंडे गाड़े. जन सभाओं में नेहरू ने अपनी आशिकी आवाज से इस जुबान में खूब रंग जमाया.

नेहरू में अंग्रेजियत तो थी. किन्तु यह कभी उनकी देशभक्ति में आड़े नहीं आया. वे ब्रिटिश तौर-तरीकों व रहन-सहन को पसंद तो करते थे, किन्तु ब्रिटिशों की साम्राज्यवादी और दमनकारी नीतियों का वे पुरजोर विरोध करते थे. उनके विचारों पर पड़े पाश्चात्य प्रभाव का एक खुलासा ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में इतिहास पर की गई इस टिपण्णी में दिखता है जब वे कहते हैं कि “कदीम हिन्दुस्तान में यह बात गौर तलब थी कि जिस तरह यूनान के समृद्ध इतिहास को लिखने वाले यूनानी इतिहासकार नहीं हुए उसी तरह हिन्दुस्तान के समृद्ध इतिहास को लिखने वाले हिन्दुस्तानी इतिहासकार नहीं हुए.” इससे लगता है कि जिस समय नेहरू अपने अध्ययन व मनन चिंतन से विश्व इतिहास की झलकियों को पढ़ कर इतिहास विद हो रहे थे उस समय उनके पास हिन्दुस्तानी इतिहासकारों का लिखा विशेष कुछ नहीं रहा होगा.. और वे केवल पाश्चात्य व अन्य विदेशी लेखकों की किताबों पर ही निर्भर हुए होंगे.

नेहरू केवल विश्व-स्तर के राजनेता ही नहीं एक बड़े लेखक भी थे. उनकी पांच महत्वपूर्ण किताबें थीं. वे अंग्रेजी में लिखते थे. उनकी एक पुस्तक ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ का हिंदी अनुवाद प्रेमचंद ने किया था. पुस्तक में नेहरू ने प्रेमचंद के प्रति कृतज्ञता जाहिर की है संभवतः उन्हें एक संस्करण का रायल्टी भी दिलवाया था. इसी किताब के १९७७ के संस्करण में इंदिरा जी लिखती हैं कि “मेरे पिता ने मुझे उन लोगों के बारे में बताया जिन्होंने अपने विचारों और कार्यों द्वारा तथा साहित्य और कला के माध्यम से दूसरों को प्रभावित किया. उन्हें सबसे ज्यादा आनंद आता था हमारे अद्भुत देश के बारे में बोलने, बताने और लिखने में, इसकी प्राचीन उपलब्धियों और इसके गौरवमय इतिहास तथा बाद की इसकी अवनति तथा गुलामी के बारे में बताने में. एक बात जो उनके दिमाग में सबसे ज्यादा रहती थी. वह थी स्वतंत्रता की – केवल भारत की ही नहीं बल्कि दुनिया के समस्त लोगों की स्वतंत्रता की.”

एक अत्यंत आश्चर्य जनक सच्चाई यह भी है कि साहित्य में नोबल पुरस्कार के लिए सर विंस्टन चर्चिल के साथ पंडित जवाहर लाल नेहरू का नामांकन भी हुआ था. दोनों की ही एक राजनीतिज्ञ, वक्ता, लेखक एवं प्रधानमंती के रूप में विश्वव्यापी प्रतिष्ठा, मान्यता तथा ख्याति थी. लेकिन कमेटी का निर्णय चर्चिल के पक्ष में गया

चर्चिल और नेहरू दोनों वाकपटु और विनोदी स्वाभाव के थे और इन दोनों की संसद व अन्यत्र बैठकों में की गई चुटीली टिप्पणियों को संग्रहित करके कई किताबें छापी और बेचीं जाती थीं. ये पतली-सी पुस्तिकाएँ फुटपाथों पर बहुत सस्ते दाम में मिल जाया करती थीं. किताब का नाम होता था ‘नेहरू और चर्चिल के चुटकुले’. एक बार लोकसभा में एक सांसद महोदय ने किसी महिला बिल को लेकर सदन में अच्छा वक्तव्य दिया. उनके बाद नेहरू खड़े हुए और बोले कि “मैं जानना चाहता हूँ कि जिन्होंने अभी अभी महिलाओं के पक्ष में इतना दमदार भाषण दिया वे स्वयं पुरुष हैं अथवा महिला?” सदन ठहाकों से गूंज उठा था.

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भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

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भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

धमतरी आसपास
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स्मृति शेष- बाबू जी, मोतीलाल वोरा

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस में हलचल

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राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा- मर्यादित भाषा में रखें अपनी बात

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल  ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन
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मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन

मरवाही उपचुनाव
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प्रमोद सिंह राजपूत कुम्हारी ब्लॉक के अध्यक्ष बने

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ओवैसी की पार्टी ने बदला सीमांचल का समीकरण! 11 सीटों पर NDA आगे

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ग्वालियर में प्रेस वार्ता

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अमित और ऋचा जोगी का नामांकन खारिज होने पर बोले मंतूराम पवार- ‘जैसी करनी वैसी भरनी’

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, भूपेश बघेल बिहार चुनाव के स्टार प्रचारक बिहार में कांग्रेस 70 सीटों में चुनाव लड़ रही है

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म
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सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म

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हाथरस गैंगरेप के घटना पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने क्या कहा, पढ़िए पूरी खबर

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पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना के बाद, पीसीसी चीफ ने जांच समिति का किया गठन