कविता आसपास : बेटी – तारक नाथ चौधुरी [ चरोदा – भिलाई, छत्तीसगढ़ ]
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बेटी
शुक्रतारा हो तुम मेरे गगन का।
भला भूलूँगा कैसे पथ कहो तुम। बेटी मेरी हो तुम गंगा सी पावन।
दिवस-रजनी मुझमें अविरत बहो तुम।।
कभी न भाग्य-रेखाओं में उलझा।
कर्म से ही हर इक उलझन है सुलझा।।
किंतु जबसे जुडी़ जीवन से मेरे।
अपनी इस प्राप्ति को सौभाग्य समझा।।
तुमको पाकर मेरे मृत स्वप्न जागे।
समस्त कठिनाईयाँ-दुःख दूर भागे।।
तुम्हारी इक हँसी पर उत्सर्ग जीवन।
तुम हो वातावरण मेरी धरा के।।
▪️ कवि संपर्क –
▪️ 83494 08210
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chhattisgarhaaspaas
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