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- ■ 5 सितंबर शिक्षक दिवस पर विशेष : ■ तारकनाथ चौधुरी.
■ 5 सितंबर शिक्षक दिवस पर विशेष : ■ तारकनाथ चौधुरी.
♀ पुरस्कार.
♀ तारकनाथ चौधुरी
बात,लगभग तीन वर्ष पुरानी है किन्तु स्मृति-पटल पर आज भी सुबह की धूप की तरह उज्ज्वल और अम्लान है।राजनाँदगाँव निवासी मेरे शिक्षक मित्र श्री भीमराव रामटेके मुझसे मिलने,अपनी दुपहिया वाहन से आ रहे थे।सुबह9बजकर30पर उन्होंने मोबाईल पर घर से चरोदा के लिए निकलने की सूचना दी।इधर घर पर मैंने पत्नी को मित्र के आने की ख़बर के साथ कुछ ज़रूरी हिदायतें दी और बाजा़र को निकल पडा़।लगभग आधे घंटे बाद मैं बाजा़र से लौटा-मित्र की पसंद की कुछ सब्जियाँ,मिठाईयाँ और पान के दो बीडे़ लेकर।दोपहर के ११.३०बजे तक जब मित्र घर नहीं पहुँचा तो मुझे चिंता होने लगी।मैंने फोन किया लेकिन उसका फोन बंद होने की सूचना मिल रही थी।किसी बात को लेकर व्यग्र हो जाने का नैसर्गिक दोष सक्रिय हो चला था और आशंकायें जनमने-मरने लगी थीं।इसी मध्य मेरे मोबाइल की घंटी बज उठी और मैंने स्क्रीन पर नाम देखे बगैर ही कॉल रिसीव कर लिया।मगर ये क्या-आवाज़ मेरे मित्र भीमराव की न होकर विद्यालय के विद्यार्थी की थी।वो घबराई हुई आवाज़ में कह रहा था-“सर प्रणाम!आप,प्लीज़ जल्दी से ज्योति हाॅस्पिटल आ जाईये,आपके मित्र का रोड एक्सिडेंट हुआ है।”मैं बेतहाशा हॉस्पिटल की तरफ भागा।मित्र केजुएलिटी में था।उसके सिर पर,दाहिने हाथ और पाँव में पट्टियाँ बँधी थी,वो लेटा हुआ था।उसके सिरहाने मेरे विद्यालय का वही छात्र बैठा हुआ था,जिसने फोन पर मित्र के दुर्घटनाग्रस्त होने की सूचना दी थी।मुझे देखकर वो तपाक् से खडा़ हुआ और फिर झुककर प्रणाम की मुद्रा में अभिवादन किया।इससे पहले कि मै प्रश्नों की झोली उडे़लता,मित्र ने अपने होंठों पर तर्जनी रख मुझे चुप रहने का सांकेतिक निर्देश डाला।इतने सारे ज़ख्मों का दर्द भुलाकर उसे मुस्कुराता देख मैं अवाक् था।उसके मुख-मंडल में पीडा़ का अभिलेख न होकर असीम शांति और संतुष्टि के भाव थे।मैं कृत्रिम क्रोध भरे स्वर में उससे ऐसी हँसी का कारण पूछा तो प्रत्युत्तर में जो कुछ भी उसने कहा उसे सुन गंभीर घाव में भी शीतलता का अनुभव निश्चित था।वो कहने लगा–“भाऊ!(स्नेहिल संबोधन)आज इस विद्यार्थी ने आपको ऐसा पुरस्कार दिया है,जिसके आगे चापलूसों को दिये जाने वाले बडे़-बडे़ ईनाम और प्रशस्ति पत्र तुच्छ हैं।”
आपने अपने विद्यार्थियों के हृदय मे करूणा,सेवा,सहयोग जैसी मानवीय संवेदनाओं का ऐसा त्रिदीप प्रज्वलित किया है,जिसके प्रकाश में मानव का व्यक्तित्व निर्माण होता है और इसी मानवता का प्रमाण मेरी जान बचाकर इस विद्यार्थी ने दिया है।धन्य हैं आप और आपका शिक्षकीय धर्म।”
कृतज्ञता-बोध से सराबोर भाषण-शैली में कही गई मित्र की बातें सुन मैं हँस पडा़।
उसके हाथों को अपने हाथों में लेकर मैंने उसे समझाया कि ऐसे श्रेष्ठ पुरस्कार का हक़दार अकेला मैं नहीं,मेरे विद्यालय का सकल शिक्षक समुदाय है जिनका समवेत प्रयास ही छात्रों के चरित्र निर्माण में प्रभावी भूमिका निभाता है।मैंने अपने शिक्षकीय जीवन में सतत् विद्यार्थियों के अंतस् को परिष्कार करने का ही प्रयास किया है जिसके प्रतिफल मुझे शिक्षक से गुरु में परिणत होने का सौभाग्य मिला है।
हमारी बातचीत की अवधि में ही दृष्टि बचाकर वो मेरा शिष्य जा चुका था।जाते-जाते हमें वो सिखा गया था कि सेवादान के बदले,कृतज्ञता ज्ञापन की आस रखना सेवा धर्म का अपमान करना है।
कौतूहल-शांति के लिए बता दूँ कि वर्तमान में हमारा वो विद्यार्थी भारतीय सैनिक का हिस्सा है और लद्दाख में अपनी सेवायें दे रहा है।
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chhattisgarhaaspaas
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