कविता श्रृंखला आरंभ : डॉ. शिरोमणि माथुर

[ • छत्तीसगढ़ रत्न से सम्मानित वयोवृद्ध वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शिरोमणि माथुर की पांच पुस्तकों ‘चल रे मनवा हद के पार’, ‘अंतरध्वनि’, ‘ समय की पुकार’, ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ और ‘स्वर्णिम रश्मियाँ’ का विमोचन एक भव्य समारोह ‘दल्लीराजहरा’ में सम्पन्न हुआ था. • डॉ. शिरोमणि माथुर की साहित्य के प्रति गहन निष्ठा, निरंतर लेखन और समाज को नई दिशा देने वाली रचना हम सबको कुछ लिखने की प्रेरणा देती है. इनकी रचनाएँ केवल शब्दों का संग्रह नहीं होता है, बल्कि समाज को जागरूक करने वाली चेतना की मशाल भी होती है. • डॉ. शिरोमणि माथुर कहती हैं कि- उम्र एक संख्या है, सृजन एवं समाज को जागरूकता करने की कोई समय सीमा तय नहीं होती. • डॉ. शिरोमणि माथुर जन-पक्षधर की कवयित्री हैं, इनकी रचनाएँ कविताएँ संवेदनशील चित्रण समाज को प्रस्तुत करती हैं. – संपादक]
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युद्ध

रोज लड़ाई कर रहे , लड़ते देश विदेश
लाशें बिछती धरा पर , बदले सबके वेश ।
अहंकार वर्चस्व की , लगती मन में आग
पूरा जग जल रहा है , कहीं सकें ना भाग ।
उनके करमों कि सजा , भुगत रहे निर्दोष
ट्रम्प , पुतिन ख़ोमनोई, किसको देये दोष ।
अपने स्वार्थो के लिये , बहा रहे हैं खून
आज जहालत जीतती , सस्ता मानव खून ।
मानवता मर गई है , जिसका करते गान
आजादी बन्दी हुयी , ढोंगी बने महान ।
बच्चो का भी ध्यान नहीं, आज तड़फते बाल
खेल कूद सब बंद है , खाने को बेहाल ।
कितनी जाने लुट गई , बालक हुये अनाथ
कलियाँ मुरझाती गई , आज क्रूरता साथ ।
ईरान या इजराइल , सबका दुख है एक
मरते सैनिक युद्ध में , विधवा हुयी अनेक ।
दर्द सभी का एक है , सभी हुये असहाय
हैं विनाश अब सामने , सबके मुख से हाय ।
अरबों की संपत्ति गई , लाखों लाश बिछाय
उनको पॉवर चाहिये , चाहे जग मर जाय ।
यदि बच्चे भी ना बचे , जगत हुआ वीरान
धरती बंजर होयगी , ऐसा क्या विज्ञान ।
किस पर शासन करोगे , क्या मारोगे शान
इतने नीचे गिरेंगे, क्या कहिए इन्सान।
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युद्ध करें अवरुद्ध

मानवता रो रही है , लोग हुए हैं क्रुद्ध
युद्ध हो रहे जगत में , करिये अब अवरुद्ध।
कुछ को आयुध बेचने , कुछ को चहिये तेल,
निर्दोषी मर रहें हैं ,अभिलाषायें फेल।
सबको अपनी पड़ी है , अपना स्वारथ होय
लाशों पर वे खड़े हैं , नहीं सुनाई होय।
सैनिक मरते जा रहे , बालक हुए अनाथ
बाला विधवा हो गई , छूटा पति का साथ ।
मात – पिता असहाय हैं , नैनो बरसे नीर
तड़फ रहे हैं दुखों में , मन में छायी पीर।
घायल मनवा उन्हों का , गये सहारे छूट
आग लगी है घरों में , मची हुयी है लूट।
मानवता के रुदन पर , होते रोज प्रहार
कई मुखौटे लगे हैं , करें वार पर वार ।
रोज मिसाइल फेंकते , अति घमंड में आय
यह जग लाशों से पटा , उनकी समझ न आय।
आज विवश है नागरिक , मातायें लाचार
रोते बालक वृद्ध है , मिटे सभी आचार ।
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chhattisgarhaaspaas
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